सैद्धान्तिक प्रवचन
आचार्य हरिशंकर अग्निहोत्री
( वैदिक प्रवक्ता)
हम नियमित रुप से सैद्धान्तिक चर्चा आरम्भ कर रहे हैं। जो तर्क और प्रमाणों पर आधारित होगी। यदि आपको इस चर्चा में कोई प्रश्न उपस्थित हो तो अवश्य रखने की कृपा करेंगें। हमारा उद्देश्य केवल और केवल सत्य सिद्धान्तों का प्रचार करना है किसी के दिल को दुखाना नहीं।
क्योंकि सत्य ज्ञान के बिना किसी का कल्याण सम्भव नही है।
आपसे निवेदन है इस चर्चा पर चिन्तन करें और अपने विचार भी प्रस्तुत करें।
“विश्व कल्याण का आधार वेद”
० सर्व प्रथम यह जानना आवश्यक है कि हमारा सम्पूर्ण व्यवहार ज्ञान पर आधारित है। मनुष्य ज्ञान अर्जित करता है फिर व्यवहार करता है ।
० संसार में सब कुछ सीखना पड़ता है या तो हम स्वयं प्रयास करें या कोई निकट सम्पर्क में आने वाला हमें सिखा दे।
० मनुष्य के पास जन्म के समय ज्ञान ना के बराबर होता है जिस जिस परिवेश में रहता है सहज ही सम्बन्धियों के द्वारा अपनी जानकारी सिखा दी जाती हैं।
० सत्य ज्ञान का आदि स्रोत वेद है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में सृष्टि के प्रथम मनुष्यों को दिया और वहीं से ज्ञान के आदान प्रदान की परम्परा चली ।
० यदि परमेश्वर ज्ञान नही देता तो संसार में कही ज्ञान का व्यवहार नही होता।
० मनुष्य के बच्चे को सम्पूर्ण मानवीय व्यवहार से पृथक रखा जाय तो वह कभी भी मनुष्यता नहीं सीख सकता।
० सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर ने वेद के माध्यम से मनुष्य को सम्पूर्ण ज्ञान दिया ।
० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि “वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों परम धर्म है।”
० महर्षि अत्रि ने कहा – वेद से महान शास्त्र विश्व में नहीं है।”
० महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा – “वेद अनन्त ज्ञान का भण्डार है।”
० वेद से ही हमारे पूर्वजों ने जीवन जीने का और सबकी सर्वांगीण उन्नति का सारा ज्ञान अर्जित करके विश्व का कल्याण किया है।
० आज हम वेद से बहुत दूर हो गये है या यों कहें कि कुछ लोंगो ने स्वार्थ से या अज्ञानता से हमें वेद से दूर किया है। तो सारा विश्व सुख से दूर हो गया है । इसीलिए महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने कहा कि – “वेदों की ओर लौटो” ।
० संसार के सभी ग्रन्थ ज्ञान अर्जित करके लिखे गये हैं तथा संसार के सभी मनुष्य ज्ञान अर्जित करके ही कुछ कहने (उपदेश करने ) की स्थिति में होते हैं। और जितना अर्जित कर लेते हैं उतना ही बता सकते है । इस बात को परखना है तो यह जान लीजिए कि संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नही मिलेगा जो सब जानता हो। हां यह हो सकता है कि एक विषय में कुछ अधिक जानकारी अर्जित की हो या कुछ विषयों में सही और अधिक जानकारी अर्जित की हो लेकिन यह नही हो सकता कि हर विषय में सब जानता हो।
अपना और विश्व का कल्याण करना है तो वेद मार्ग ही अपनाना होगा ।
वेद परिचय
वेद ईश्वर प्रदत्त संसार का पूर्ण एवं हितकारी ज्ञान है ,जिसको धारण करने से प्रत्येक व्यक्ति को ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र को सुख मिल सकता है। मनुष्यों को अपने जीवन को सफलता पूर्वक चलने के लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता है वह ज्ञान वेद में है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व का कल्याण केवल वेद मार्ग से ही सम्भव है, अर्थात विश्व में वैदिक व्यवस्था स्थापित करने से ही सुख शान्ति हो सकती है। आज विश्व जल रहा है, चारों ओर त्राहि त्राहि हो रही है, सभी चिन्तित हैं कि हमें कैसे शान्ति मिलेगी ? इसका उत्तर है कि वेदों में वर्णित आचार संहिता को जीवन में धारण करने से सुख शान्ति अवश्य मिलेगी।
महर्षि दयानन्द सरस्वती आर्य समाज के तृतीय नियम में लिखते हैं – “वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है ,वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। “
प्राचीन ऋषियों, मुनियों तथा वेदज्ञ विद्वानों की अवधारणा के अनुसार वेद सब सत्य विद्याओं का स्रोत और भण्डार है, वेदो में समस्त विद्याओं का बीज पाया जाता है , यह विशेषता अन्य तथाकथित ईश्वरीय पुस्तकों में नहीं है। अतः वेद ज्ञान सार्वभौमिक , सार्वकालिक और सार्वदेशिक है।
वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है…
व्यक्ति की उन्नति के सारे सूत्र वेद में मिलते हैं। भोजन कैसा, कितना, तथा कैसे करना है, व्यायाम, संयम, सत्य, अहिंसा, दान, विद्या, पुरुषार्थ, आदि से व्यक्तित्व विकास, पुनर्जन्म, ईश्वर-जीव-प्रकृति त्रैतवाद का ज्ञान, ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था तथा योग साधना द्वारा मोक्ष प्राप्ति केवल वेद से ही हो सकती है।
वेदों में वर्णित व्यवस्था ही धर्म है, वेदों में जिन कार्यों को करने के लिए निषेध है वे कार्य नहीं करने चाहिए। निषेध कार्यो का करना अधर्म है, असत्याचरण, चोरी करना, व्यभिचार, जुआ खेलना, मदिरा पान, मांस भक्षण तथा हिंसा करना वेद में निषेध है अर्थात् इन कार्यों को करना अधर्म है।
परिवार के प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य वेदों में वर्णित है। समाज के व्यक्तियों का कर्तव्य भी वेदों में दिया गया है जिसके आचरण से सर्वत्र सुख फैलता है।
वेदों में क्या-क्या है यह तो बहुत गहराई से सोचने का विषय है परन्तु इतना तो अवश्य कह सकते हैं कि वेदों में परा-अपरा विद्या, लौकिक एवं पारलौकिक ज्ञान भण्डार, धर्म-अधर्म, श्रेय-प्रेय, सत्य-असत्य, प्रवृत्ति-निवृत्ति, कर्म-अकर्म, कर्त्तव्य-अकर्तव्य, हित-अहित, पाप-पुण्य, जीवन- मृत्यु, शुद्ध-अशुद्ध, मित्र-अमित्र, प्रेम-द्वेष, श्रद्धा-अश्रद्धा, सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, एकादशी-सर्वदेशी, नीति-अनीति, आदि विवरण, राष्ट्र निर्माण, नारी सम्मान, गौ आदि प्राणी रक्षा, शिल्प विद्या, वाणिज्य विद्या, संगीत विद्या, भूगर्भ विद्या, खगोल विद्या, सूर्यादि लोक लोकान्तरों का भ्रमण, आकर्षण धारण के सिद्धान्त, प्राणी शास्त्र, मनोविज्ञान, प्रकाशाप्रकाश्यलोक, विद्युत आदि का विवेचन, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशादि विवरण, रोग निदान, औषधि, चिकित्सा प्रकार, यव, माष, तन्दुल, धान्यादि अन्न, कृषि, पशु, पक्षी, कृमि, कीटादि का विवरण, स्वर्ण, चाँदी, ताम्रादि धातुओं का ज्ञान, भाषा विज्ञान, गणित शास्त्र, सामुद्रिक ज्ञान, नौविमानादि का स्वरूप विवरण, विवाहादि संस्कार, दिन, पक्ष, ऋतु, अयन, वर्ष, आदि कल विभाजन, प्रभु की स्तुति, प्रार्थना, उपासनादि योग, राज-प्रजा धर्म, वर्णाश्रम व्यवस्था, पंचमहायज्ञ, की प्रक्रिया, विवेचन विद्यमान है।
महाराज मनु के अनुसार ” वेदो खिलो धर्म मूलं”, महर्षि याज्ञबल्कि के अनुसार “अनन्ताः वै वेदाः”तथा महर्षि अत्रि के अनुसार ” नास्ति वेदात् परं शास्त्रं ” कहा गया है वेद ही धर्म है, वह अनन्त है, इससे महान कोई शास्त्र नहीं है।
वेद विषयक एक आश्चर्य जनक सत्य यह है कि – संसार की सभी पुस्तकों में प्रक्षेप हुआ है किन्तु वेद आज तक अप्रक्षिप्त रूप में उपलब्ध हैं। इसका कारण यही है कि परमात्मा की वाणी को सुरक्षित रखने के लिए ऋषियों ने कई प्रकार की पाठविधि बनाकर ऐसी व्यवस्था की कि इसमें एक भी बिन्दु का प्रक्षेप होने की सम्भावना न रहे। संसार के किसी भी ग्रन्थ के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं की गयी।
सत्य सनातन वैदिक धर्म के आगे दुनियाँ का कोई सम्प्रदाय अपने सम्प्रदाय की डींग नहीं मार सकता है।
“वेद ज्ञान ही सर्वोपरि है।”
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् ।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे । । (मनु०)
(सः) उस परमात्मा ने (सर्वेषां तु नामानि) सब पदार्थों के नाम (यथा – गो – जाति का ‘गौ’, अश्वजाति का ‘अश्व’ आदि) (च) और (पृथक् – पृथक् कर्माणि) भिन्न – भिन्न कर्म (यथा – ब्राह्मण के वेदाध्यापन, याजन; क्षत्रिय का रक्षा करना; वैश्य का कृषि, गोरक्षा, व्यापार आदि अथवा मनुष्य तथा अन्य प्राणियों के हिंस्त्र – अहिंस्त्र आदि कर्म (च) तथा (पृथक् संस्थाः) पृथक् – पृथक् विभाग (जैसे – प्राणियों में मनुष्य, पशु, पक्षी आदि या व्यवस्थाएं (यथा – चारवर्णों की व्यवस्था (आदौ) सृष्टि के प्रारम्भ में (वेदशब्देभ्यः एव) वेदों के शब्दों से ही (निर्ममे) बनायीं ।
इस वचन के अनुकूल आर्य लोगों ने वेदों का अनुकरण करके जो व्यवस्था की, वह सर्वत्र प्रचलित है । उदाहरणार्थ – सब जगत् में सात ही बार हैं, बारह ही महीने हैं और बारह ही राशियां हैं, इस व्यवस्था को देखो स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में उक्त श्लोक के बाद ये वाक्य कहे हैं।’’ वेद में भी कहा है – शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।। (यजु० ४०।८) ‘‘अर्थात् आदि सनातन जीवरूप प्रजा के लिए वेद द्वारा परमात्मा ने सब विद्याओं का बोध किया है ।’’
० ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद यह चार वेद हैं और यह ही केवल प्रामाणिक ग्रन्थ हैं अन्य ग्रन्थों में केवल वही और उतना ही जो और जितना वेद के अनुकूल हो मान्य है, वेद विरुद्ध होने पर कोई भी ग्रन्थ प्रामाणिक नही होता ।
० आचार्य सायण ने कृष्ण यजुर्वेद की तैत्ति. सं. के उपोद्घात में स्वयमेव लिखा है—
प्रत्क्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते।
एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता।
अर्थात्-प्रत्यक्ष अथवा अनुमान प्रमाण से जिस तत्त्व (विषय) का ज्ञान प्राप्त नहीं हो रहा हो, उसका ज्ञान भी वेदों के द्वारा हो जाता है। यही वेदों का वेदत्व है।
० ऐसा भी प्रसिद्धि है कि परमात्मा ने सृष्टि के प्रारम्भ में ही ‘वेद’ के रूप में अपेक्षित ज्ञान का प्रकाश कर दिया। महाभारत में ही महर्षि वेदव्यास ने इस सत्य का उद्घाटन करते हुए लिखा है—
अनादि निधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा।
आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ।। (महा. शा. प. 232, 24)। अर्थात्—सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू परमात्मा से ऐसी दिव्य वाणी (वेद) का प्रादुर्भाव हुआ, जो नित्य है और जिससे संसार की गतिविधियाँ चलीं। स्थूल बुद्धि से यह अवधारणा अटपटी सी-कल्पित सी लगती है, किन्तु है सत्य।
० स एष पूर्वेषामपि गुरुःकालेनानवच्छेदात् (योग द०)
जैसे वर्तमान समय में हम लोग अध्यापकों से पढ़ ही के विद्वान होते हैं वैसे परमेश्वर सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए अग्नि आदि ऋषियों का गुरु अर्थात् पढ़ाने हारा है, क्योंकि जैसे जीव सुषुप्ति और प्रलय में ज्ञान रहित हो जाते हैं, वैसा परमेश्वर नही होता । उसका ज्ञान नित्य है।
० जैसा माता-पिता अपने सन्तानों पर कृपा दृष्टि कर उन्नति चाहते हैं, वैसे ही परमात्मा ने सब मनुष्यों पर कृपा करके वेदों को प्रकाशित किया है, जिससे मनुष्य अविद्यान्धकार भ्रमजाल से छूटकर विद्या विज्ञान रूप सूर्य को प्राप्त होकर अत्यानन्द में रहें और विद्या तथा सुखों की वृद्धि करते जायें।
“वेद सन्देश”
० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के वेद विषय में लिखते हैं- वेद में अवयव विषय तो अनेक हैं परन्तु उनमें से चार मुख्य हैं- एक विज्ञान अर्थात् सब पदार्थों का यथार्थ जानना, दूसरा कर्म, तीसरा उपासना, और चौथा ज्ञान है। विज्ञान उसको कहते हैं कि जो कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों से यथावत उपयोग लेना और परमेश्वर से लेकर तृण पर्यन्त पदार्थों का साक्षात् बोध होना, उनसे यथावत् उपयोग का करना इससे यह विषय इन चारों में भी प्रधान है क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है । सो भी दो प्रकार का है एक तो परमेश्वर का यथावत् ज्ञान और उसकी आज्ञा का यथावत् पालन करना , और दूसरा यह है कि उसके रचे हुए सब पदार्थों के गुणों को यथावत् विचार के कौन कौन पदार्थ किस किस प्रयोजन के लिए रचे हैं । और इन दोनों में से भी ईश्वर का जो प्रतिपादन है सो ही प्रधान है।
० वेद ईश्वरीय संविधान है इस व्यवस्था में चलकर सुखी एवं सम्पन्न रहते हुए मुक्ति तक प्राप्त की जा सकती है। वेद के विरोधी आचरण से दुःख प्राप्त होता है।
० यहाँ वेदों में वर्णित कुछ आचरण का उल्लेख किया जारहा है जिसका उपदेश समय समय पर अनेक महापुरुषों के द्वारा किया जाता रहा है।
विस्तार से आगे लिखेंगे-
संश्रुतेन गमेमहि (अथर्ववेद)
हम वेद के वताये मार्ग पर चलें।
समानि वः आकूति (ऋग्वेद)
हमारे विचार समान हों।
पुमान् पुमांसं परिपातु विश्वतः (यजुर्वेद)
मनुष्य मनुष्य की सब प्रकार से रक्षा करें।
‘स्वाहा यज्ञं कृणोतन’
‘यज्ञेन वर्धत् जातवेदसम् ‘(ऋग्वेद)
हे मनुष्यो ! तुम यज्ञ द्वारा उत्पन्न होकर प्रकाश देने वाली यज्ञाग्नि को बढ़ाओ।
अक्षैर्मादीव्यः (ऋग्वेद)
जुआ मत खेलो।
गां मा हिंसीः (यजुर्वेद)
गाय की हिंसा मत करो।
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् (अथर्ववेद)
भाई भाई से द्वेष न करे।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ (यजुर्वेद)
हे मनुष्य! इस जगत में वेदोक्त कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष या सौ से भी अधिक वर्ष तक जीने की इच्छा कर। इस प्रकार उत्तम कर्म करने से मनुष्य कर्म बन्धन में नहिं बंधता । इसके अतिरिक्त भव सागर से छूटने का कोई मार्ग नहीं है।
तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् | (ऋग्वेद)
संसार का ताना बाना बुनता हुआ (सांसारिक कर्तव्य कर्म और व्यवहारों को करते हुआ) प्रकाश के पीछे जा अर्थात् ज्ञान युक्त कर्म कर , बुद्धि से बनाया, बुद्धि से परिष्कृत और ऋषियों द्वारा प्रदत्त तथा ज्योति से युक्त मार्ग की रक्षा कर अर्थात् ज्ञान से युक्त मार्ग पर चल।
मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् (ऋग्वेद)
हे मनुष्य! तू मनुष्य बन और दिव्य सन्तानों को जन्म दे।
यह संसार विशालतम है लेकिन यह सम्पूर्ण संसार ही नही अनन्त ब्रह्माण्ड भी केवल तीन सत्ताओं से ही व्यवस्थित है , परमात्मा, जीव और प्रकृति जो कि तीनों ही अनादि सत्तायें है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में वेद का प्रमाण देते हुए लिखते हैं –
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते |
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति || ( ऋग्वेद : १-१६४-२० )
( द्वा ) जो ब्रह्म और जीव दोनों ( सुपर्णा ) चेतनता और पालनादी गुणों से सदृश ( सयुजा ) व्याप्य – व्यापक भाव से संयुक्त ( सखाया ) परस्पर मित्रतायुक्त , सनातन अनादि हैं ; और ( समानम् ) वैसा ही ( वृक्षम् ) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न – भिन्न हो जाता है , वह तीसरा अनादि पदार्थ ; इन तीनों के गुण , कर्म और स्वभाव भी अनादि हैं । ( तयोरन्यः ) इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है , वह इस वृक्षरूप संसार में पाप पुण्य रूप फलों को ( स्वाद्वत्ति ) अच्छे प्रकार भोगता है , और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को ( अनश्नन् ) न भोगता हुआ चारों ओर अर्थात भीतर-बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है । जीव से ईश्वर , ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न-स्वरूप तीनों अनादि हैं ।
अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां स्वरूपाः ।
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः।। (उपनिषद)
प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिनका जन्म कभी नहीं होता और न कभी ये जन्म लेते अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण हैं, इनका कारण कोई नही। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ फसता है और उसमें परमात्मा न फसता और न उसका भोग करता है।
प्रश्न – जगत के कारण कितने हैं?
उत्तर – तीन, एक निमित्त, दूसरा उपादान, तीसरा साधारण।
निमित्त कारण उसको कहते हैं कि जिसके बनाने से कुछ बने, न बनाने से न बने। आप स्वयं बने नहीं, दूसरे को प्रकारान्तर से बना देवे।
दूसरा उपादान कारण उसको कहते हैं जिसके बिना कुछ न बने , वही अवस्थान्तररूप होके बने और बिगड़े भी।
तीसरा साधारण कारण उसको कहते हैं जो बनाने में साधन और साधारण निमित्त हो।
निमित्त कारण दो प्रकार के हैं । एक – सब सृष्टि को कारण से बनाने , धारण और प्रलय करने तथा सब की व्यवस्था रखने वाला मुख्य निमित्त कारण परमात्मा । दूसरा – परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेकविध कार्यान्तर बनाने वाला, साधारण निमित्त कारण जीव। उपादान कारण प्रकृति, परमाणु जिसको सब संसार के बानने की सामग्री कहते हैं, वह जड़ होने से आप से आप न बन और न बिगड़ सकती है, किन्तु दूसरे के बनाने से बनती और बिगाड़ाने से बिगड़ती है।
“ईश्वर विषय”
अब हम क्रमशः तीनों सत्ताओं ( ईश्वर, जीव और प्रकृति) के बारे में जानेंगे।
वैसे तो संसार में ईश्वर के विषय में इतनी अलग अलग और गलत गलत मान्यतायें प्रचलित हैं जिससे संसार की बहुत बड़ी हानि हूई है और हो रही है, परन्तु वैदिक मान्यता ही सत्य है और उसी के जानने और मानने और वैदिक मान्यता से ही उपासना करने पर जीवन सफल हो सकता है अभीष्ट की सिद्धि हो सकती है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सारांश रूप में ईश्वर के बारे में लिखते हैं – “ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप , निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।”
स पर्यगाच्छुक्रमकायमब्रणमस्नाविरम शुद्धमपापविद्धम, |
कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभूर्याथातथ्यतोsर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्यः || (यजुर्वेद)
हे मनुष्य! जो ब्रह्म शीघ्रकारी सर्वशक्तिमान स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित छिद्र रहित और नही छेद करने योग्य नाड़ी आदि के साथ सम्बन्ध रूप बन्धन से रहित अविद्यादि दोषों से रहित होने से सदा पवित्र और जो पाप युक्त पापकारी और पाप में प्रीति करने वाला कभी नहीं होता सब ओर से व्याप्त है जो सर्वत्र सब जीवों के मनों की वृत्तियों को जानने वाला दुष्ट पापियों का तिरस्कार करने वाला और अनादिस्वरूप जिसकी संयोग से उत्पत्ति वियोग से विनाश माता पिता गर्भवास जन्म वृद्धि और मरण नहीं होते वह परमात्मा सनातन अनादिस्वरूप अपने अपने स्वरूप से उत्पत्ति और विनाशरहित प्रजाओं के लिए यथार्थ भाव से वेद द्वारा सब पदार्थों को विशेषकर बनाता है वही परमेश्वर तुम लोगों को उपासना करने के योग्य है।
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। (यजुर्वेद)
(यत्) जो (इदम्) प्रकृति से लेकर पृथिवी पर्यन्त (सर्वम्) सब (जगत्याम्) प्राप्त होने योग्य सृष्टि में (जगत्) चरप्राणीमात्र ( ईशा ) संपूर्ण ऐश्वर्य से युक्त सर्वशक्तिमान परमात्मा से (वास्यम्) सब ओर से व्याप्त है।
इंद्र मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:। (ऋग्वेद)
इस मन्त्र में यह स्पष्टतया बताया गया है कि परमेश्वर एक ही है किन्तु विद्वान् उसके अनन्त गुणों को सूचित करने के लिए इन्द्र मित्र वरुण आदि नामों से पुकारते हैं। इस प्रकार इन्द्र मित्र वरुणादि शब्द मुख्यतया ईश्वर-वाचक हैं यह स्पष्ट सिद्ध होता है। परमात्मा परमैश्वर्य सम्पन्न होने से इन्द्र, सबका मित्र तथा प्रेममय होने से मित्र, सबसे उत्तम और वरणीय तथा अविद्यादि दोष निवारक होने से वरुण, ज्ञान स्वरूप और अग्रणी सबसे श्रेष्ठ होने से अग्नि पद से उसे कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, महेश्वर, महादेव, बृहस्पति इत्यादि शब्द प्रधानतया उसी एक परमेश्वर को सूचित करते हैं। यह निम्न मन्त्रों से सिद्ध होता है।
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्य:। त्वं ब्रह्मा रयिविद्ब्रह्मणस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरंध्या।। ऋ०
त्वमग्ने राजा वरुणो धृतव्रतस्त्वं मित्रो भवसि दस्म ईड्य:। त्वमर्यमा सत्पतिर्यस्य सम्भुजं त्वमंशो विदथे देव भाजयु:।। ऋ०
त्वमग्ने रुद्रो असुरो महो दिवस्त्वं शर्धो मारुतं पृक्ष ईशिषे। त्वं वातैररुणैर्यासि शंगयस्त्वं पूषा विधत: पासि नु त्मना।। ऋ०
सोऽर्यमा स वरुण: स रुद्र: स महादेव:।
सो अग्नि: स उ सूर्य: स उ एव महायम:। अथर्व०
त्वमिन्द्रस्त्वम्महेन्द्रस्त्वं लोकस्त्वं प्रजापति:।
तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद्विष्णो बहुधा वीर्याणि।। अथर्व०
इन मन्त्रों पर यदि निष्पक्ष विचार किया जाये तो स्पष्ट ज्ञात होता है कि एक ही परमात्मा के ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वृषभ, बृहस्पति, अग्नि, प्रजापति, वरुण, मित्र, अर्यमा, पूषा आदि नाम हैं और इस प्रकार वेदों में अनेकेश्वरवाद के भ्रम का कोई स्थान नहीं रहता। सत्य ग्रहण करने में उद्यत और पाश्चात्य विद्वानों की मानसिक दासता को स्वीकार करने वाले विद्वानों को इन मन्त्रों का अच्छी प्रकार मनन करना चाहिए तब उनका वैदिक एकेश्वरवाद में दृढ़ विश्वास हो जायेगा, इसमें सन्देह नहीं। इन मन्त्रों पर विचार करने से हीन देवतावाद का भी खण्डन हो जाता है।
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा:।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ताऽआप: स प्रजापति:।। यजु०
यह मन्त्र भी एकेश्वरवाद का प्रतिपादन करते हुए उसी परमेश्वर के अग्नि, आदित्य, वायु, चन्द्रादि नाम हैं, इस बात को स्पष्ट घोषित करता है। ऐसे मन्त्रों के भाव को लेकर ही कैवल्योपनिषद् में-
सब्रह्मा सविष्णु सरुद्र: सशिव: सोऽक्षर:।
स परम:स्वराट्। स इन्द्र: स कालाग्नि: स चन्द्रमा:।।
ईश्वर एक है तो अनेक की मान्यता गलत हुई। एक बात और जानना आवश्यक है कि परमेश्वर अपने कार्य सृष्टि के निर्माण आदि के लिए किसी अन्य देवी या देवता का निर्माण कर कार्य नही कराता है क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है अर्थात् अपना कार्य करने के लिए वह किसी की सहायता नही लेता । अलग अलग देवी देवताओं की कल्पना मध्यकाल की है जब वैदिक मान्यताओं के प्रचार में कमी आगयी थी।
परमेश्वर स्वयं ही सृष्टि का निर्माता है, वही पालक है और वही सृष्टि का विनाश भी करता है इसीकारण परमेश्वर के ही ब्रह्मा आदि नाम है।
स ब्रह्मा स विष्णुः स रूद्रस्स शिवस्सो अक्षरस्स परमः स्वराट।
स इन्द्रस्स कालाग्निस्स चन्द्रमाः।। (उपनिषद)
सब जगत् के बनाने से ‘ब्रह्मा’, सर्वत्र व्यापक होने से ‘विष्णु’, दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से ‘रुद्र’, मङ्गलमय और सबका कल्याणकर्ता होने से ‘शिव’, सर्वत्र व्याप्त अविनाशी होने से ‘अक्षर’, स्वयं प्रकाशस्वरूप होने से ‘स्वराट’, प्रलय में सबका काल और काल का भी काल होने से परमेश्वर का नाम कालाग्नि है।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यस्स सुपर्णो गरुत्मान् ।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः।। (ऋग्वेद)
जो एक अद्वितीय सत्यब्रह्म वस्तु है उसी के इन्द्रादि सब नाम है, दिव्य – जो प्रकृत्यादि दिव्य पदार्थों मे व्याप्त, सुपर्ण – जिसके उत्तम पालन और पूर्णकाम हैं, गरुत्मान् – जिसका आत्मा अर्थात् स्वरूप महान है, मातरिश्वा – जो वायु के समान अनन्त बलवान है, इसीलिए परमात्मा के दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान् और मातरिश्वा ये नाम हैं। शेष नामों की चर्चा आगे करेंगे।
अज्ञानता से परमेश्वर के इन्हीं नामों के अलग अलग रूप मानकर अलग अलग मूर्तियाँ गढ़ ली हैं और मनगढ़ंत कहानियाँ भी बनाकर अनेक ग्रन्थ भी लिख दिये है और दुर्भाग्यवश उन्ही का प्रचलन हो गया है, जिनसे हित होने की थोड़ी भी सम्भावना नहीं है।
सभी का कल्याण केवल वेदमार्ग से ही सम्भव है।
आज हम परमेश्वर के नामों की चर्चा करेंगे। फिर आगे की चर्चाओं में परमेश्वर के स्वरूप और कार्यों को बतायेंगे।
जैसे मनुष्य एक होता है उसके कर्मों के आधार पर अनेक नाम होते हैं ( जैसे मेरा नाम हरिशंकर है साथ ही मैं उपदेश करता हूं तो मुझे उपदेशक कहा जाता है, मैं अध्यापन कार्य करता हूं तो अध्यापक कहते हैं, खेती करने से किसान कहा जाता है तथा कुछ सम्बन्धवाचक भी नाम पुत्र, भाई, पिता और पति आदि भी अनेक नामों से कहते हैं)। वैसे ही परमेश्वर एक है चूंकि परमेश्वर के अनन्त गुण – कर्म है इसीलिए गुणों और कर्मों के आधार पर परमेश्वर के अनेक नाम हैं।
० परमेश्वर का मुख्य नाम “ओ३म्” है –
ओ३म् खम्ब्रह्म । ( यजुर्वेद )
“अवतीत्योम, आकाशमिव व्यापकत्वात् खम्, सर्वेभ्यो बृहत्वाद् ब्रह्म” रक्षा करने से ओम् आकाशवत् व्यापक होने से खं और सबसे बड़ा होने से ब्रह्म ईश्वर का नाम है।
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत् । (छन्दोग्य उपनिषद)
ओ३म् जिसका नाम है और जो कभी नष्ट नहीं होता उसी की उपासना करनी योग्य है, अन्य की नहीं ।
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम् । ( माण्डूक्य उपनिषद)
सब वेदादिशास्त्रों में परमेश्वर का प्रधान और निज नाम “ओ३म् ” को कहा है अन्य सब गौणिक नाम हैं।
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।। (कठोपनिषद)
क्योंकि सब वेद सब धर्मानुष्ठान रूप तपश्चरण जिसका कथन और मान्य करते और जिसकी प्राप्ति की इच्छा करके ब्रह्मचर्याश्रम करते है, उसका “ओ३म्” है।
० परमेश्वर का मुख्य और निज नाम “ओ३म् ” है तथा गुण-कर्मों के अनुसार अनेक नाम है –
सब जगत के बनाने हारे से “ब्रह्मा”।
सर्वत्र व्यापक होने से “विष्णु”।
दुष्टों को दण्ड देके रुलाने से “रुद्र”।
मंगलमय और सबका कल्याण कर्ता होने से “शिव”।
स्वप्रकाश होने से “अग्नि”।
विज्ञान स्वरुप होने से “मनु”।
सब का पालन करने से “प्रजापति”।
परमेश्वर्यवान् होने से “इन्द्र”।
सबका जीवन मूल होने से “प्राण”।
निरन्तर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम “ब्रह्म” है।
“भवन्ति भूतानि यस्यां सा भूमिः” जिसमें सब भूत प्राणी होते हैं, इसीलिए ईश्वर का नाम “भूमि” है।
जो चराचर जगत का धारण, जीवन और प्रलय करता है और सब बलवानों से बलवान है, इससे उस ईश्वर का नाम “वायु” है।
“य ईष्टे सर्वैश्वर्यवान् वर्त्तते स ईश्वरः” जिसका सत्य विचार-शील-ज्ञान और अनन्त ऐश्वर्य है, इससे उस परमात्मा का नाम ईश्वर है।
‘मेदते मिद्यते, स्निह्यति स्निह्यते वा स मित्रः’ जो सबसे स्नेह करे और सबको प्रीति करने योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम “मित्र” है।
जो आत्मयोगी, विद्वान्, मुक्ति की इच्छा करने वाले मुक्त और धर्मात्माओं का स्वीकारकर्त्ता, अथवा जो शिष्ट मुमुक्षु मुक्त और धर्मात्माओं से ग्रहण किया जाता है वह ईश्वर ‘वरुण’ संज्ञक है। अथवा ‘वरुणो नाम वरः श्रेष्ठः’ जिसलिए परमेश्वर सब से श्रेष्ठ है, इसीलिए उस का नाम ‘’वरुण” है।
‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ इस यजुर्वेद के वचन से जो जगत् नाम प्राणी, चेतन और जंगम अर्थात् जो चलते-फिरते हैं, ‘तस्थुषः’ अप्राणी अर्थात् स्थावर जड़ अर्थात् पृथिवी आदि हैं, उन सब के आत्मा होने और स्वप्रकाशरूप सब के प्रकाश करने से परमेश्वर का नाम ‘सूर्य’ है।
‘यो बृहतामाकाशादीनां पतिः स्वामी पालयिता स बृहस्पतिः’ जो बड़ों से भी बड़ा और बड़े आकाशादि ब्रह्माण्डों का स्वामी है, इस से उस परमेश्वर का नाम ‘बृहस्पति’ है।
‘अत सातत्यगमने’ इस धातु से ‘आत्मा’ शब्द सिद्ध होता है। ‘योऽतति व्याप्नोति स आत्मा’ जो सब जीवादि जगत् में निरन्तर व्यापक हो रहा है। ‘परश्चासावात्मा च य आत्मभ्यो जीवेभ्यः सूक्ष्मेभ्यः परोऽतिसूक्ष्मः स परमात्मा’ जो सब जीव आदि से उत्कृष्ट और जीव, प्रकृति तथा आकाश से भी अतिसूक्ष्म और सब जीवों का अन्तर्यामी आत्मा है, इस से ईश्वर का नाम ‘परमात्मा’ है।
सामर्थ्यवाले का नाम ईश्वर है। ‘य ईश्वरेषु समर्थेषु परमः श्रेष्ठः स परमेश्वरः’ जो ईश्वरों अर्थात् समर्थों में समर्थ, जिस के तुल्य कोई भी न हो, उस का नाम ‘परमेश्वर’ है।
‘दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु’ इस धातु से ‘देव’ शब्द सिद्ध होता है। (क्रीडा) जो शुद्ध जगत् को क्रीडा कराने (विजिगीषा) धार्मिकों को जिताने की इच्छायुक्त (व्यवहार) सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता (द्युति) स्वयंप्रकाशस्वरूप, सब का प्रकाशक (स्तुति) प्रशंसा के योग्य (मोद) आप आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देनेहारा (मद) मदोन्मत्तों का ताड़नेहारा (स्वप्न) सब के शयनार्थ रात्रि और प्रलय का करनेहारा (कान्ति) कामना के योग्य और (गति) ज्ञानस्वरूप है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।
‘पृथु विस्तारे’ इस धातु से ‘पृथिवी’ शब्द सिद्ध होता है।’ ‘यः पर्थति सर्वं जगद्विस्तृणाति तस्मात् स पृथिवी’ जो सब विस्तृत जगत् का विस्तार करने वाला है, इसलिए उस ईश्वर का नाम ‘पृथिवी’ है।
‘जल घातने’ इस धातु से ‘जल’ शब्द सिद्ध होता है, ‘जलति घातयति दुष्टान् सङ्घातयति अव्यक्तपरमाण्वादीन् तद् ब्रह्म जलम्’ जो दुष्टों का ताड़न और अव्यक्त तथा परमाणुओं का अन्योऽन्य संयोग वा वियोग करता है, वह परमात्मा ‘जल’ संज्ञक कहाता है।
‘काशृ दीप्तौ’ इस धातु से ‘आकाश’ शब्द सिद्ध होता है, ‘यः सर्वतः सर्वं जगत् प्रकाशयति स आकाशः’ जो सब ओर से सब जगत् का प्रकाशक है, इसलिए उस परमात्मा का नाम ‘आकाश’ है।
‘अद् भक्षणे’ इस धातु से ‘अन्न’ शब्द सिद्ध होता है। जो सब को भीतर रखने, सब को ग्रहण करने योग्य, चराऽचर जगत् का ग्रहण करने वाला है, इस से ईश्वर के ‘अन्न’, ‘अन्नाद’ और ‘अत्ता’ नाम हैं।
‘चदि आह्लादे’ इस धातु से ‘चन्द्र’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यश्चन्दति चन्दयति वा स चन्द्रः’ जो आनन्दस्वरूप और सब को आनन्द देनेवाला है, इसलिए ईश्वर का नाम ‘चन्द्र’ है।
‘मगि गत्यर्थक’ धातु से ‘मङ्गेरलच्’ इस सूत्र से ‘मङ्गल’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यो मङ्गति मङ्गयति वा स मङ्गलः’ जो आप मङ्गलस्वरूप और सब जीवों के मङ्गल का कारण है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘मङ्गल’ है।
‘बुध अवगमने’ इस धातु से ‘बुध’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यो बुध्यते बोध्यते वा स बुधः’ जो स्वयं बोधस्वरूप और सब जीवों के बोध का कारण है। इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘बुध’ है। ‘
‘ईशुचिर् पूतीभावे’ इस धातु से ‘शुक्र’ शब्द सिद्ध हुआ है। ‘यः शुच्यति शोचयति वा स शुक्रः’ जो अत्यन्त पवित्र और जिसके संग से जीव भी पवित्र हो जाता है, इसलिये ईश्वर का नाम ‘शुक्र’ है।
‘चर गतिभक्षणयोः’ इस धातु से ‘शनैस्’ अव्यय उपपद होने से ‘शनैश्चर’ शब्द सिद्ध हुआ है। ‘यः शनैश्चरति स शनैश्चरः’ जो सब में सहज से प्राप्त धैर्यवान् है, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘शनैश्चर’ है।
‘रह त्यागे) इस धातु से ‘राहु’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यो रहति परित्यजति दुष्टान् राहयति त्याजयति स राहुरीश्वरः’। जो एकान्तस्वरूप जिसके स्वरूप में दूसरा पदार्थ संयुक्त नहीं, जो दुष्टों को छोड़ने और अन्य को छुड़ाने हारा है, इससे परमेश्वर का नाम ‘राहु’ है।
‘कित निवासे रोगापनयने च’ इस धातु से ‘केतु’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यः केतयति चिकित्सति वा स केतुरीश्वरः’ जो सब जगत् का निवासस्थान, सब रोगों से रहित और मुमुक्षुओं को मुक्ति समय में सब रोगों से छुड़ाता है, इसलिए उस परमात्मा का नाम ‘केतु’ है।
[ ध्यान दें – आपने पढ़ा कि परमेश्वर के पृथ्वी, जल, सूर्य, बृहस्पति और शनैश्चर आदि नाम है तो क्या यह शनैश्चर आदि जो ग्रह या अन्य जल आदि पदार्थ है यह अब भी ईश्वर हैं क्या ? देव, ईश्वर, भगवान, जीव और अन्य सब पदार्थों को कैसे पृथक-पृथक समझें इसके लिए आगे की चर्चा में लिखेंगे]
ध्यान दें-
० परमेश्वर को देव, भगवान, ईश्वर, ब्रह्मा, विष्णु, देवी और शनैश्चर आदि नामों से जाना जाता है तथा भगवान और शनि आदि शब्दों को परमेश्वर से अलग अन्य पदार्थों के लिए भी प्रयोग किया जाता है।
० ओ३म् और अग्न्यादि नामों के मुख्य अर्थ से परमेश्वर का ही ग्रहण होता है, जैसा कि व्याकरण, निरुक्त, ब्राह्मण, सूत्रादि, ऋषियों और मुनियों के व्याख्यानों से परमेश्वर का ग्रहण देखने में आता है, वैसा ग्रहण करना सबको योग्य है, परन्तु “ओ३म्” यह तो केवल परमात्मा का ही नाम है और अग्नि आदि नामों से परमेश्वर के ग्रहण में प्रकरण और विशेषण नियम कारक है। इससे क्या सिद्ध होता है कि जहां-जहां स्तुति, प्रार्थना, उपासना, सर्वज्ञ, व्यापक, शुद्ध, सनातन और सृष्टिकर्ता आदि विशेषण लिखे हैं, वहीं-वहीं इन नामों से परमेश्वर का ग्रहण होता है और जहां-जहां ऐसे प्रकरण है कि –
ततो विराडजायत विराजोऽअधि पूरुषः।
श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत। ।
तेन देवा अयजन्त।
पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥(यजुर्वेद)
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधिभ्योऽन्नम्। अन्नाद्रेतः। रेतसः पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः।(तैत्तिरीयोपनिषद्)
ऐसे प्रमाणों में विराट्, पुरुष, देव, आकाश, वायु, अग्नि, जल, भूमि आदि नाम लौकिक पदार्थों के होते हैं, क्योंकि जहाँ-जहाँ उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, अल्पज्ञ, जड़, दृश्य आदि विशेषण भी लिखे हों, वहाँ-वहाँ परमेश्वर का ग्रहण नहीं होता। वह उत्पत्ति आदि व्यवहारों से पृथक् हैं और उपरोक्त मन्त्रों में उत्पत्ति आदि व्यवहार हैं, इसी से यहाँ विराट् आदि नामों से परमात्मा का ग्रहण न हो के संसारी पदार्थों का ग्रहण होता है। किन्तु जहाँ-जहाँ सर्वज्ञादि विशेषण हों, वहीं-वहीं परमात्मा और जहाँ-जहाँ इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और अल्पज्ञादि विशेषण हों, वहाँ-वहाँ जीव का ग्रहण होता है, ऐसा सर्वत्र समझना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर का जन्म-मरण कभी नहीं होता, इससे विराट् आदि नाम और जन्मादि विशेषणों से जगत् के जड़ और जीवादि पदार्थों का ग्रहण करना उचित है, परमेश्वर का नहीं।
० विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है – जहां परमेश्वर को भगवान कहते हैं वहां ऐश्वर्यवान मनुष्य को भी भगवान कह सकते है लेकिन यहां यह समझना आवश्यक है कि परमेश्वर शरीर धारण नही करता और जो मनुष्य ऐश्वर्यशाली है जिसे हम भगवान कह सकते है वह परमेश्वर नही हो सकता।
० जैसे परमेश्वर के सत्य, न्याय, दया, सर्वसामर्थ्य और सर्वज्ञत्वादि अनन्त गुण हैं, वैसे अन्य किसी जड़ पदार्थ वा जीव के नहीं हैं। जो पदार्थ सत्य है, उस के गुण, कर्म, स्वभाव भी सत्य ही होते हैं। इसलिये सब मनुष्यों को योग्य है कि परमेश्वर ही की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करें, उससे भिन्न की कभी न करें। क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वज महाशय विद्वान्, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्यों ने भी परमेश्वर ही में विश्वास करके उसी की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करी, उससे भिन्न की नहीं की। वैसे हम सब को करना योग्य है।
० वर्तमान में वैचारिक प्रदूषण इतना है कि सैद्धान्तिक रूप से ईश्वर, जीव और प्रकृति की सही सही जानकारी समाज में प्रचारित नही है।
० कुछ ऐसा मानते हैं कि ईश्वर है ही नही सब कुछ प्रकृति से ही बना है , और कुछ ईश्वर को तो मानते हैं लेकिन जीव और प्रकृति के अस्तित्व को नकारते हैं और कहते हैं कि सब कुछ ईश्वर में से ही बना है । कुछ ऐसा कहते हैं कि ईश्वर और प्रकृति है तथा जीव तो ईश्वर का ही अंश है , और कुछ कहते हैं कि ईश्वर और जीव हैं प्रकृति तो परमात्मा ने बनायी है। इनको अद्वैतवाद, द्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद आदि नामों से प्रचारित किया गया है।
० यहां यह जानना आवश्यक है कि यह जगत किसी भी मनुष्य की व्यक्तिगत मान्यताओं पर आधारित नही चलता और एक बात जो बहुत चिन्तन करने योग्य है जिसकी चर्चा हमने आरम्भ में की ( सैद्धान्तिक चर्चा १ और २) कि मनुष्य के पास ज्ञान बहुत थोड़ा है ईश्वर ही ज्ञान का प्रकाशक है बिना ईश्वर के कहीं भी ज्ञान नही आ सकता, निमित्त से वेद का ठीक से अध्ययन करने बाद ही सिद्धान्तों को समझा जा सकता है।
० इस सम्पूर्ण जड़ और चेतन जगत में तीन अनादि तत्व हैं – एक ईश्वर दूसरा जीव और तीसरा प्रकृति ।
= ईश्वर एक ऐसी सत्ता है जो सर्वव्यापक है, सर्वशक्तिमान है और निराकार आदि अनन्त गुणों वाली है काया(शरीर) में नही आती है
= जीव एकदेशी है, अल्प सामर्थ्य वाला है और मनुष्य, पशु आदि शरीर धारण करती है।
= प्रकृति से ही सम्पूर्ण जगत का निर्माण होता है – महत्, अहम् मन, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रिया, तन्मात्रायें और स्थूल भूत- अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश और इनसे वनस्पति और जन्तुओं के शरीर आदि का निर्माण प्रकृति से ही बनता है।
= ईश्वर इस जगत को प्रकृति से बनाता है और फिर जीव जब मनुष्य के शरीर में आकर परमेश्वर के वेद ज्ञान को समझकर इस सृष्टि के पदार्थों से ही कुछ वस्तुओं का निर्माण करता है। जैसे मिट्टि परमेश्वर ने मूल प्रकृति से बनायी है और फिर मनुष्य मिट्टी से घट आदि का निर्माण करता है ।
० विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है जब जब किसी शब्द से यह समझ नही आये कि यह किसके लिए (ईश्वर, जीव और प्रकृति के लिए ) प्रयोग किया गया है जैसे शनि कौन है चूंकि परमेश्वर का भी नाम शनैश्चर है और शनि किसी मनुष्य का भी नाम हो सकता है और शनि सूर्य की परिक्रमा करने वाला ग्रह भी है, तब कैसे पहचाने कि शनि शब्द किसके लिए किसका ग्रहण किया जाय । पछली चर्चा में भी इस विषय को स्पष्ट किया गया था यहां कुछ और सरलता से स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज के आधार पर ही इसका ठीक ठीक स्पष्टीकरण करण हो सकता है महर्षि कहते है कि जब जब ऐसा हो तो विशेषण जान लो अर्थात् विशेषण जानने से पदार्थ का सही बोध होता है ।
एक उदाहरण लेते हैं – एक व्यक्ति विद्यालय के द्वार पर आकर द्वारपाल को कहता है कि मुझे रमेश से मिलना है तब द्वारपाल चिन्तन करने लगता है कि विद्यालय के प्रधानाचार्य का नाम रमेश है, गणित के अध्यापक का नाम रमेश है और एक रमेश नाम का विद्यार्थी भी है अब इस व्यक्ति को किसके पास भेजूं । अब यहां यह सही होगा कि उस व्यक्ति से यह पूछा जाय कि रमेश क्या करता है तब सही रमेश से मिलाया जायेगा , ऐसा पूछने पर उस व्यक्ति ने कहा कि वह गणित पढा़ता है तब रमेश से मिलाने में कोई समस्या नही रही। ठीक इसी प्रकार
जहां-जहां स्तुति, प्रार्थना, उपासना, करने योग्य सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, शुद्ध, सनातन और सृष्टिकर्ता आदि विशेषण लिखे हैं, वहीं-वहीं परमेश्वर का ग्रहण होता है
और जहाँ-जहाँ उत्पत्ति, प्रलय , जड़, दृश्य आदि विशेषण हों, वहाँ-वहाँ परमेश्वर का ग्रहण नहीं होता। वह उत्पत्ति आदि व्यवहारों से पृथक् हैं तब परमात्मा का ग्रहण न हो के संसारी पदार्थों का ग्रहण होता है।
और जहाँ-जहाँ इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और अल्पज्ञादि विशेषण हों, वहाँ-वहाँ जीव का ग्रहण होता है, ऐसा सर्वत्र समझना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर का जन्म-मरण कभी नहीं होता।
यह चर्चा वाट्साप के अनेक समूहों में साझा की जाती है, फेसबुक और ट्यूटर पर भी डाली जाती है जो सज्जन पुनः पढ़ना चाहें या किसी को पढ़ाना चाहें तो “http://shankaragra.blogspot.com” नामक ब्लाग पर पढ़-पढ़ा सकते हैं। इस चर्चा को बहुत संख्या में सज्जन पढ़ते हैं, पसन्द भी करते है और कुछ सज्जन अपनी टिप्पणी भी लिखते हैं ।
यह चर्चा चूंकि लगातार की जा रही तथा आगे की चर्चा पिछली चर्चा से जुड़ी हुई होती है अतः सभी चर्चाओं को ध्यान से पढ़े।
आपसे निवेदन है कि आप सभी सज्जन अपनी टिप्पणी अवश्य लिखने की कृपा करें।
ध्यान दीजिए –
एक सज्जन ने इसी विषय को और स्पष्ट करने को कहा है तो आइए कुछ और लिखते हैं। [इस प्रकार के विषयों को ठीक ठीक से समझने के लिए वेद और ऋषियों के साहित्य का नित्य अध्ययन करना चाहिए]
० परमेश्वर, जीव और प्रकृति तीनों अनादि हैं, तीनो का अस्तित्व हमेशा रहता है, और ना तो ये एक दूसरे से बनते हैं और ना ही एक दूसरे में विलीन होते हैं। तीनों के कुछ गुणों में समानता होने से इनके एक ही होने की भ्रान्ति होने की सम्भावना हो सकती है।
जैसे परमेश्वर का एक नाम देव है और कुछ मनुष्यों को भी देव कहते हैं तथा प्रकृति के बने सूर्यादि पदार्थों को भी देव कहते हैं।
यहां यह जानना अत्यावश्यक है कि देव कहने से मनुष्य परमेश्वर नही हो जायेगा और सूर्य भी परमेश्वर या मनुष्यों जैसे व्यवहार करने योग्य नही हो जायेगा।
‘दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु’ इस धातु से ‘देव’ शब्द सिद्ध होता है। (क्रीडा) जो शुद्ध जगत् को क्रीडा कराने (विजिगीषा) धार्मिकों को जिताने की इच्छायुक्त (व्यवहार) सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता (द्युति) स्वयंप्रकाशस्वरूप, सब का प्रकाशक (स्तुति) प्रशंसा के योग्य (मोद) आप आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देनेहारा (मद) मदोन्मत्तों का ताड़नेहारा (स्वप्न) सब के शयनार्थ रात्रि और प्रलय का करनेहारा (कान्ति) कामना के योग्य और (गति) ज्ञानस्वरूप है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।
उपरोक्त गुणों के आधार पर परमेश्वर देव कहलाता है तथा महर्षि यास्क के अनिसार ‘देव’ शब्द के अनेक अर्थ हैं – ” देवो दानाद् वा , दीपनाद् वा , द्योतनाद् वा , द्युस्थानो भवतीति वा | ” ( निरुक्त – ७ / १५ ) तदनुसार ‘देव’ का लक्षण है ‘दान’ अर्थात देना | जो सबके हितार्थ दान दे , वह देव है | देव का गुण है ‘दीपन’ अर्थात प्रकाश करना | सूर्य , चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं | देव का कर्म है ‘द्योतन’ अर्थात सत्योपदेश करना | जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है | देव की विशेषता है ‘द्युस्थान’ अर्थात ऊपर स्थित होना | ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को , समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को , और राष्ट्र में ऊपर स्थित होने से राजा को भी देव कहते हैं | इस प्रकार ‘देव’ शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है |
यहां हमने समझा कि परमेश्वर भी देव है, जीव भी देव है और प्रकृति भी देव है लेकिन फिर भी तीनों एक नहीं है अलग अलग हैं।
इसीप्रकार
० ‘भज सेवायाम्’ इस धातु से ‘भग’ इससे मतुप् होने से ‘भगवान्’ शब्द सिद्ध होता है। ‘भगः सकलैश्वर्यं सेवनं वा विद्यते यस्य स भगवान्’ जो समग्र ऐश्वर्य से युक्त वा भजने के योग्य है, इसीलिए उस ईश्वर का नाम ‘भगवान्’ है।
तथा
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ।।
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य―इन छह का नाम भग है। इन छह गुणों से युक्त महान व्यक्ति को भगवान कहा जा सकता है। इनमें से जिसके पास एक भी हो उसे भी भगवान् कहा जा सकता है। श्रीराम के पास तो थोड़ी बहुत मात्रा में ये सारे ही गुण थे इसलिए उन्हें भगवान कहकर सम्बोधित किया जाता है।
श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्री हनुमान, मनु महाराज आदि महापुरुष भगवान् थे ईश्वर नहीं थे, न ईश्वर के अवतार थे। वे एक महामानव थे। एक महापुरुष थे। महान आत्मा थे।
महान आत्मा अनेकों होती हैं।लेकिन परमात्मा केवल एक ही होता है।
ईश्वर को भी भगवान् कह सकते हैं परन्तु शरीरधारी कभी ईश्वर नहीं हो सकता, ईश्वर एक, निराकार, सर्वशक्तिमान् चेतन सत्ता है।
किसी महापुरुष के नाम के आगे जिसमें उपरोक्त गुण हों ‘भगवान्’ शब्द लगा सकते हैं।
जैसे― भगवान् राम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान् मनु, भगवान् दयानन्द आदि। लेकिन इससे वें ईश्वर नहीं हो जाते।
ईश्वर एक ही है जो सर्वशक्तिमान्, निराकार, अजन्मा, सर्वज्ञ और सर्वान्तर्यामी आदि गुणों से युक्त है।
ऐसा ही सर्वत्र समझना चाहिए।
मूर्ति पूजा पर बहुत घमासान होता रहता है आज हम इस विषय पर चर्चा करेंगे।
० परमेश्वर की कोई मूर्ति नही हो सकती क्योंकि वेद में उल्लेख है –
“न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः । हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिं सीदित्येषा यस्मान्न जात इत्येषः ॥” ( यजुर्वेद ३२।३)
– हे मनुष्यो ! ( यस्य ) जिसका ( महत ) पूज्य बडा ( यशः ) कीर्ति करनेहारा धर्मयुक्त कर्म का आचरण ही ( नाम ) नामस्मरण है , जो ( हिरण्यगर्भः ) सूर्य बिजुली आदि पदार्थो का आधार ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) अन्तर्यामी होने से प्रत्यक्ष जिसकी ( मा ) मुझको ( मा, हिंसत ) मत ताड्ना दे वा वह अपने से मुझ को विमुख मत करे, ( इति ) इस प्रकार ( एषा ) यह प्रार्थना वा बुद्धि और ( यस्मात ) जिस कारण ( न ) नही ( जातः ) उत्पन्न हुआ ( इति ) इस प्रकार ( एषः ) यह परमात्मा उपासना के योग्य है । ( तस्य ) उस परमेश्वर की ( प्रतिमा ) प्रतिमा – परिमाण उसके तुल्य अवधि का साधन का साधन प्रतिकृति , मूर्ति वा आकृति ( न , अस्ति ) नही है ।
— हे मनुष्यो ! जो कभी देहधारी नहीं होता , जिसका कुछ भी परिमाण सीमा का कारण ( ‘कारण’ अर्थात जिसके होने से कार्य होता है ) नही है , जिसकी आज्ञा का पालन ही उसका नामस्मरण करना है, जो उपासना किया हुआ अर्थात जिसकी सब उपासना करते है, अपने उपासकों पर अनुग्रह ( कृपा ) करता है. वेदों के अनेक स्थलों में जिसका महत्व कहा गया है, जो नहीं मरता , न विकृत होता है ,न नष्ट होता उसी की उपासना निरन्तर करो । जो इससे भिन्न की उपासना तो करोगे तो इस महान पाप से युक्त हुए आप लोग दुःख – क्लेशों से नष्ट हो जाओगे ॥
० परमेश्वर सर्व व्यापक है-
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्याञ्जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्य स्विद् धनम्॥ (यजुर्वेद ४०/१)
हे मनुष्य! जो कुछ इस संसार में जगत् है उस सब में व्याप्त होकर जो नियन्ता है वह ईश्वर कहाता है। उस से डर कर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर। उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग॥
० ईश्वर निराकार। क्योंकि जो साकार होता तो व्यापक नहीं हो सकता। जब व्यापक न होता तो सर्वज्ञादि गुण भी ईश्वर में न घट सकते। क्योंकि परिमित वस्तु में गुण, कर्म, स्वभाव भी परिमित रहते हैं तथा शीतोष्ण, क्षुधा, तृषा और रोग, दोष, छेदन, भेदन आदि से रहित नहीं हो सकता। इस से यही निश्चित है कि ईश्वर निराकार है। जो साकार हो तो उसके नाक, कान, आंख आदि अवयवों का बनानेहारा दूसरा होना चाहिये। क्योंकि जो संयोग से उत्पन्न होता है उस को संयुक्त करनेवाला निराकार चेतन अवश्य होना चाहिये। जो कोई यहां ऐसा कहै कि ईश्वर ने स्वेच्छा से आप ही आप अपना शरीर बना लिया तो भी वही सिद्ध हुआ कि शरीर बनने के पूर्व निराकार था। इसलिए परमात्मा कभी शरीर धारण नहीं करता किन्तु निराकार होने से सब जगत् को सूक्ष्म कारणों से स्थूलाकार बना देता है।
जब परमेश्वर का आकार नही हैं, परिमाण नही है तो मूर्ति किस आधार बन बनायी जायेगी अर्थात् संसार में जितनी भी मूर्तियाँ बनी है उनमें एक भी मूर्ति परमेश्वर की नहीं हैं।
अब विचार करते है कि मूर्तियाँ किसकी हैं? तो सैद्धान्तिक रूप से यह कहा जा सकता है कि कुछ मूर्तियाँ मनुष्यों में श्रेष्ठ महापुरुषों की हैं और कुछ मूर्तियाँ काल्पनिक बनायी गयी हैं क्योंकि दो से अधिक हाथ और एक से अघिक सिर या मनुष्य के धड़ पर अन्य किसी पशु आदि का सिर या पशु आदि के धड़ पर मनुष्य का सिर हो, ऐसा कभी कोई पैदा नही हुआ यह सब पुराणों की गलत मान्यतायें है, यह मान्यतायें अवैदिक हैं ।
और यह चर्चा हम पूर्व में कर चुके हैं वेद विरुद्ध मान्यताओं को मानने पर हानियां ही हानियां है।
वेद ही केवल सत्य हैं, मान्य हैं और अन्य वेद विरुद्ध पुराण आदि अमान्य ग्रन्थ हैं, मिथ्या हैं।
[ मूर्ति पूजा से कितनी हानियां है तथा लाभ सा प्रतीत क्यों होता है इस विषय पर आगे चर्चा करेंगे। ]
प्रथम हम यह समझ लें कि परमेश्वर की कोई मूर्ति नही है। हमारे महापुरुषों की मूर्तियाँ बनायी गयी उनके चरित्र को बताने के लिए।
तीन हजार वर्ष से पहले भारतवर्ष में मूर्ति पूजा प्रचलित नही थी।
मन्दिरों में जितनी मूर्तियाँ हैं उनमें से अधिकतर काल्पनिक हैं ।
जैसे शनि नामक ग्रह की मनुष्य जैसी मूर्ति बनाना कल्पना है क्योंकि शनि नामक ग्रह जड़ है वह हमारे व्यवहार को जानने की सामर्थ्य नही रखता, और वह किसी के ऊपर भी नही आता है यह अन्ध विश्वास है। इसीप्रकार लक्ष्मी आदि की मूर्ति बनाना। क्योंकि लक्ष्मी नामक किसी देवता का वर्णन वेद में नही है, वेद में लक्ष्मी शब्द आता है तो उसके परमेश्वर और सुलक्षणों वाली स्त्री तथा धन – सम्पदा- शोभा आदि अर्थ लिए जाते हैं।
= “लक्ष दर्शनाङ्कनयोः” इस धातु से ‘लक्ष्मी’ शब्द सिद्ध होता है। ‘यो लक्षयति पश्यत्यङ्कते चिह्नयति चराचरं जगदथवा वेदैराप्तैर्योगिभिश्च यो लक्ष्यते स लक्ष्मीः सर्वप्रियेश्वरः’ जो सब चराचर जगत् को देखता, चिह्नित अर्थात् दृश्य बनाता, जैसे शरीर के नेत्र, नासिकादि और वृक्ष के पत्र, पुष्प, फल, मूल, पृथिवी, जल के कृष्ण, रक्त, श्वेत, मृत्तिका, पाषाण, चन्द्र, सूर्यादि चिह्न बनाता तथा सब को देखता, सब शोभाओं की शोभा और जो वेदादिशास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियों का लक्ष्य अर्थात् देखने योग्य है, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘लक्ष्मी’ है। ( उसकी कोई प्रतिमा नही है।)
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्या वहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौव्यात्तम् |
इष्णन्निषाणामुं मइषाण सर्वलोकं म इषाण || ( यजुर्वेद ३१/२२)
हे जगदीश्वर ! जिस (ते) आप की (श्रीः) समग्र शोभा (च) और ( लक्ष्मीः) सब ऐश्वर्य (च) श्री (पत्न्यौ) दो स्त्रियों के तुल्य वर्तमान (अहोरात्रे) दिन रात (पार्श्वे) आगे पीछे जिस आपकी सृष्टि में (अश्विनौ) सूर्य चन्द्रमा (व्यात्तम्) फैले मुख के समान (नक्षत्राणि) नक्षत्र (रूपम्) रूप वाले हैं सो आप (मे) मेरे (अमुम्) परोक्ष सुख को (इष्णान्) चाहते हुए (इषाण) चाहना कीजिए (मे) मेरे लिए (सर्व लोकम्) सब के दर्शन को (इषाण) प्राप्त कीजिए मेरे लिए सब सुखों को (इषाण) पहुंचाइये।
एक ज्वलन्त प्रश्न है कि – परमेश्वर की तो मूर्ति बनायी ही नही जा सकती। क्या पूर्वजों की मूर्ति बनाकर पूजा करने पर लाभ होता है?
– क्या शरीर छोड़ने के बाद आत्मा हमारे सम्पर्क में आती है ? या नही ।
– हमारी प्रार्थना या भोजन सामग्री उस आत्मा ( जो शरीर छोड़कर गयी है ) तक पहुंचती है या नहीं ?
उपरोक्त प्रश्नों पर हम आगामी चर्चाओं में विस्तार से लिखेंगे यहां संक्षेप में लिखते हैं । आत्मा की शरीर छोड़ने पर दो गतियां होती हैं –
१. आत्मा मुक्ति को प्राप्त हो जाती है। ( योग साधना करने वाला आत्मा)
२. आत्मा को नया शरीर मिल जाता है। ( कर्मों के आधार पर मनुष्य या मनुष्येतर अन्य प्राणी)
मुक्ति कि स्थिति में आत्मा परमेश्वर की व्यवस्था में आनन्द भोगती है ऐसी स्थिति में आत्मा का हमसे सम्पर्क नही रहता तथा आत्मा शरीर को छोड़ने से नया शरीर प्राप्त करने तक ऐसी स्थिति में रहती है उसे स्वयं अपना ज्ञान नही होता अतिसुषुप्तावस्था में रहती है तब भी हमसे सम्पर्क नही रहता। अर्थात् शरीर छोड़ने पर आत्मा का सम्बन्धियों से सम्पर्क नही रहता ।
इसीलिए जो हमारे पूर्वज नही रहे उनसे प्रार्थना करना या उनको कुछ भोजन पहुंचाना सम्भव नही हैं। अर्थात् उनकी मूर्ति बनाकार भी पूजा करना व्यर्थ ही का कार्य रहा।
प्राचीन काल ( वैदिक काल ) में मूर्ति पूजा नहीं थी । उस काल में मूर्तियाँ अलंकार के लिए या सन्देश देने के लिए बनायी जाती थी। आज भी चित्र या मूर्ति चरित्र दर्शाने के लिए हों तो ठीक है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज का सन्देश है कि हमें चित्र की नही चरित्र की पूजा करनी चाहिए।
= आइये आगे हम चर्चा करेंगे कि क्या मूर्ति पूजा से लाभ होता है ? या केवल भ्रमवश, अज्ञानवश ऐसा लगता है।
सच तो यह है कि मूर्ति पूजा या तन्त्र, यन्त्र, टोने-टोटके, झाड़-फूंक, डाकिनी-साकिनी भूत- प्रेत की मान्यता आदि से हमें कोई लाभ नही होता बल्कि हानि ही हानि है।
संयोगवश ऐसा लगता है कि मूर्ति से लाभ हुआ है जबकि लाभ मूर्ति से नही बल्कि लाभ कर्म (पुरुषार्थ) से ही होता है।
जैसे एक बालक पढ़ाई भी करता है और मुर्ति पूजा भी करता है तथा पास होने पर पूजा से पास होना मान लेता है मेहनत से नही जबकि सही तो यही है कि मेहनत से पास हुआ है मूर्ति पूजा से नही। यदि हम ऐसा मान ले कि मूर्ति पूजा से पास हुआ है तो बिना पढ़े पास होना चाहिए जबकि ऐसा नही हो सकता ।
इसीप्रकार व्यापारी व्यापार में मेहनत भी करता है और मूर्ति पूजा भी करता है तथा व्यापार में लाभ होने को वह अपना पुरुषार्थ न मानकर लाभ का श्रेय मूर्ति पूजा को देता है जबकि ऐसा नहीं है व्यापार में लाभ कभी भी मूर्ति पूजा से नही होता हमेशा वही व्यापारी सफल होता है जो पूर्ण पुरुषार्थ करता है , संसार में ऐसे बहुत व्यापारी है जो मूर्ति पूजा से उनका कोई सम्बन्ध नही है और वह अच्छे धनवान हैं।
इसी प्रकार अन्यत्र समझना चाहिए।
यदि अभी भी लगता है कि तन्त्र, यन्त्र, टोने-टोटके, झाड़-फूंक, डाकिनी-साकिनी भूत-प्रेत और मूर्ति पूजा से भला हो सकता है तो कुछ प्रयोग किये जायें ।
उपरोक्त मूर्ति पूजा आदि साधनों से बिना अध्ययन किये किसी को परीक्षा में उत्तीर्ण कराया जाय, बिना योग्यता के किसी को अच्छी नौकरी दिलादी जाय, बिना चिकित्सा के जन्मान्ध व्यक्ति की आंखे ठीक कर दी जायें । देश की सीमा पर बिना सेना के सुरक्षा करा दी जाय। यह सब कार्य मूर्ति पूजा आदि से सम्भव नही हैं क्योंकि संसार में कारण से कार्य होता है और सफलता का कारण ज्ञान और पुरुषार्थ ही है मूर्तिपूजा नही।
मूर्ति पूजा से हांनियां – महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज एक प्रश्न के उत्तर में कुछ इस प्रकार उत्तर देते हैं —
प्रश्न – साकार में मन स्थिर होता और निराकार में स्थिर होना कठिन है इसलिये मूर्त्तिपूजा रहनी चाहिये।
उत्तर – साकार में मन स्थिर कभी नहीं हो सकता क्योंकि उस को मन झट ग्रहण करके उसी के एक-एक अवयव में घूमता और दूसरे में दौड़ जाता है। और निराकार अनन्त परमात्मा के ग्रहण में यावत्सामर्थ्य मन अत्यन्त दौड़ता है तो भी अन्त नहीं पाता। निरवयव होने से चंचल भी नहीं रहता किन्तु उसी के गुण, कर्म, स्वभाव का विचार करता-करता आनन्द में मग्न होकर स्थिर हो जाता है। और जो साकार में स्थिर होता तो सब जगत् का मन स्थिर हो जाता क्योंकि जगत् में मनुष्य, स्त्री, पुत्र, धन, मित्र आदि साकार में फंसा रहता है परन्तु किसी का मन स्थिर नहीं होता। जब तक निराकार में न लगावे। क्योंकि निरवयव होने से उस में मन स्थिर हो जाता है। इसलिये मूर्त्तिपूजा करना अधर्म है।
दूसरा—उस में क्रोड़ों रुपये मन्दिरों में व्यय करके दरिद्र होते हैं और उस में प्रमाद होता है।
तीसरा—स्त्री पुरुषों का मन्दिरों में मेला होने से व्यभिचार, लड़ाई बखेड़ा और रोगादि उत्पन्न होते हैं।
चौथा—उसी को धर्म, अर्थ, काम और मुक्ति का साधन मानके पुरुषार्थ रहित होकर मनुष्यजन्म व्यर्थ गमाता है।
पांचवां—नाना प्रकार की विरुद्धस्वरूप नाम चरित्रयुक्त मूर्त्तियों के पुजारियों का ऐक्यमत नष्ट होके विरुद्धमत में चल कर आपस में फूट बढ़ा के देश का नाश करते हैं।
छठा—उसी के भरोसे में शत्रु का पराजय और अपना विजय मान बैठे रहते हैं। उन का पराजय हो कर राज्य, स्वातन्त्र्य और धन का सुख उनके शत्रुओं के स्वाधीन होता है और आप पराधीन भठियारे के टट्टू और कुम्हार के गदहे के समान शत्रुओं के वश में होकर अनेकविधि दुःख पाते हैं।
सातवां—जब कोई किसी को कहे कि हम तेरे बैठने के आसन वा नाम पर पत्थर धरें तो जैसे वह उस पर क्रोधित होकर मारता वा गाली प्रदान देता है वैसे ही जो परमेश्वर की उपासना के स्थान हृदय और नाम पर पाषाणादि मूर्त्तियां धरते हैं उन दुष्टबुद्धिवालों का सत्यानाश परमेश्वर क्यों न करे?
आठवां—भ्रान्त होकर मन्दिर-मन्दिर देशदेशान्तर में घूमते-घूमते दुःख पाते, धर्म, संसार और परमार्थ का काम नष्ट करते, चोर आदि से पीड़ित होते, ठगों से ठगाते रहते हैं।
नववां—दुष्ट पूजारियों को धन देते हैं वे उस धन को वेश्या, परस्त्रीगमन, मद्य, मांसाहार, लड़ाई बखेडों में व्यय करते हैं जिस से दाता का सुख का मूल नष्ट होकर दुःख होता है।
दशवां—माता पिता आदि माननीयों का अपमान कर पाषाणादि मूर्त्तियों का मान करके कृतघ्न हो जाते हैं।
ग्यारहवां—उन मूर्त्तियों को कोई तोड़ डालता वा चोर ले जाता है तब हा-हा करके रोते रहते हैं।
बारहवां—पूजारी परस्त्रियों के संग और पूजारिन परपुरुषों के संग से प्रायः दूषित होकर स्त्री पुरुष के प्रेम के आनन्द को हाथ से खो बैठते हैं।
तेरहवां—स्वामी सेवक की आज्ञा का पालन यथावत् न होने से परस्पर विरुद्धभाव होकर नष्ट भ्रष्ट हो जाते हैं।
चौदहवां—जड़ का ध्यान करने वाले का आत्मा भी जड़ बुद्धि हो जाता है क्योंकि ध्येय का जड़त्व धर्म अन्तःकरण द्वारा आत्मा में अवश्य आता है।
पन्द्रहवां—परमेश्वर ने सुगन्धियुक्त पुष्पादि पदार्थ वायु जल के दुर्गन्ध निवारण और आरोग्यता के लिये बनाये हैं। उन को पुजारी जी तोड़ताड़ कर न जाने उन पुष्पों की कितने दिन तक सुगन्धि आकाश में चढ़ कर वायु जल की शुद्धि करता और पूर्ण सुगन्धि के समय तक उस का सुगन्ध होता है। उस का नाश मध्य में ही कर देते हैं। पुष्पादि कीच के साथ मिल सड़ कर उलटा दुर्गन्ध उत्पन्न करते हैं। क्या परमात्मा ने पत्थर पर चढ़ाने के लिये पुष्पादि सुगन्धियुक्त पदार्थ रचे हैं।
सोलहवां—पत्थर पर चढ़े हुए पुष्प, चन्दन और अक्षत आदि सब का जल और मृत्तिका के संयोग होने से मोरी वा कुण्ड में आकर सड़ के इतना उस से दुर्गन्ध आकाश में चढ़ता है कि जितना मनुष्य के मल का। और सहस्रों जीव उस में पड़ते उसी में मरते और सड़ते हैं।
ऐसे-ऐसे अनेक मूर्त्तिपूजा के करने में दोष आते हैं। इसलिये सर्वथा पाषाणादि मूर्त्तिपूजा सज्जन लोगों को त्यक्तव्य है। और जिन्होंने पाषाणमय मूर्त्ति की पूजा की है, करते हैं और करेंगे। वे पूर्वोक्त दोषों से न बचे। न बचते हैं, और न बचेंगे।
० इतिहास के पृष्ठों पर देखने से ज्ञात हुआ कि भारत में मूर्ति पूजा आज से लगभग २५०० वर्ष पूर्व आरम्भ हुई ।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज “सत्यार्थ प्रकाश” में लिखते हैं – ऋषभदेव से लेके महावीर पर्यन्त अपने तीर्थंकरों की बड़ी-बड़ी मूर्त्तियाँ बना कर पूजा करने लगे अर्थात् पाषाणादि मूर्त्तिपूजा की जड़ जैनियों से प्रचलित हुई। परमेश्वर का मानना न्यून हुआ, पाषाणादि मूर्त्तिपूजा में लगे। ऐसा तीन सौ वर्ष पर्यन्त आर्यावर्त्त में जैनों का राज रहा। प्रायः वेदार्थज्ञान से शून्य हो गये थे। इस बात को अनुमान से अढ़ाई सहस्र वर्ष व्यतीत हुए होंगे।
बाईस सौ वर्ष हुए कि एक शङ्कराचार्य द्रविड़देशोत्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मचर्य से व्याकरणादि सब शास्त्रों को पढ़कर सोचने लगे कि अहह! सत्य आस्तिक वेद मत का छूटना और जैन नास्तिक मत का चलना बड़ी हानि की बात हुई है। इन को किसी प्रकार हटाना चाहिये। शङ्कराचार्य शास्त्र तो पढ़े ही थे परन्तु जैन मत के भी पुस्तक पढ़े थे और उन की युक्ति भी बहुत प्रबल थी। उन्होंने विचारा कि इन को किस प्रकार हटावें? निश्चय हुआ कि उपदेश और शास्त्रार्थ करने से ये लोग हटेंगे। ऐसा विचार कर उज्जैन नगरी में आये। वहां उस समय सुधन्वा राजा था, जो जैनियों के ग्रन्थ और कुछ संस्कृत भी पढ़ा था। वहाँ जाकर वेद का उपदेश करने लगे और राजा से मिल कर कहा कि आप संस्कृत और जैनियों के भी ग्रन्थों को पढ़े हो और जैन मत को मानते हो। इसलिये आपको मैं कहता हूं कि जैनियों के पण्डितों के साथ मेरा शास्त्रार्थ कराइये। इस प्रतिज्ञा पर, जो हारे सो जीतने वाले का मत स्वीकार कर ले। और आप भी जीतने वाले का मत स्वीकार कीजियेगा।
यद्यपि सुधन्वा जैन मत में थे तथापि संस्कृत ग्रन्थ पढ़ने से उन की बुद्धि में कुछ विद्या का प्रकाश था। इस से उन के मन में अत्यन्त पशुता नहीं छाई थी। क्योंकि जो विद्वान् होता है वह सत्याऽसत्य की परीक्षा करके सत्य का ग्रहण और असत्य को छोड़ देता है। जब तक सुधन्वा राजा को बड़ा विद्वान् उपदेशक नहीं मिला था तब तक सन्देह में थे कि इन में कौन सा सत्य और कौन सा असत्य है। जब शङ्कराचार्य की यह बात सुनी और बड़ी प्रसन्नता के साथ बोले कि हम शास्त्रार्थ कराके सत्याऽसत्य का निर्णय अवश्य करावेंगे। जैनियों के पण्डितों को दूर-दूर से बुलाकर सभा कराई।
उसमें शङ्कराचार्य का वेदमत और जैनियों का वेदविरुद्ध मत था अर्थात् शङ्कराचार्य का पक्ष वेदमत का स्थापन और जैनियों का खण्डन और जैनियों का पक्ष अपने मत का स्थापन और वेद का खण्डन था। शास्त्रार्थ कई दिनों तक हुआ। जैनियों का मत यह था कि सृष्टि का कर्त्ता अनादि ईश्वर कोई नहीं। यह जगत् और जीव अनादि हैं। इन दोनों की उत्पत्ति और नाश कभी नहीं होता। इस से विरुद्ध शङ्कराचार्य का मत था कि अनादि सिद्ध परमात्मा ही जगत् का कर्त्ता है। यह जगत् और जीव झूठा है क्योंकि उस परमेश्वर ने अपनी माया से जगत् बनाया। वही धारण और प्रलय कर्त्ता है। और यह जीव और प्रपञ्च स्वप्नवत् है। परमेश्वर आप ही सब रूप होकर लीला कर रहा है।
बहुत दिन तक शास्त्रार्थ होता रहा। परन्तु अन्त में युक्ति और प्रमाण से जैनियों का मत खण्डित और शङ्कराचार्य का मत अखण्डित रहा। तब उन जैनियों के पण्डित और सुधन्वा राजा ने वेद मत को स्वीकार कर लिया। जैनमत को छोड़ दिया। पुनः बड़ा हल्ला गुल्ला हुआ और सुधन्वा राजा ने अन्य अपने इष्ट मित्र राजाओं को लिखकर शङ्कराचार्य से शास्त्रार्थ कराया। परन्तु जैन पराजित होते गये।
० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज का भी काशी में मूर्ति पूजा पर शास्त्रार्थ हुआ था जिसका वर्णन प्रो० राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने आर्य मन्तव्य में इस प्रकार किया है।
शास्त्रार्थ काशी जो सम्वत् १९२६ में स्वामी दयानन्द सरस्वती और काशी के पण्डितों के बीच आनन्द बाग में हुआ था। एक दयानन्द सरस्वती नाम संन्यासी दिगम्बर गंगा के तीर विचरते रहते हैं जो सत् पुरुष और सत्य शास्त्रों के वेत्ता हैं। उन्होंने सम्पूर्ण ऋग्वेद आदि का विचार किया है सो ऐसा सत्य शास्त्रों को देख निश्चय करके कहते हैं कि पाषाणादि मूर्ति पूजन, शैवशाक्त, गणपत और वैष्णव आदि सम्प्रदायों और रुद्राक्ष, तुलसी माला, त्रिपुण्डादि धारण का विधान कहीं भी वेदों में नहीं है। इससे ये सब मिथ्या ही हैं। कदापि इनका आचरण न करना चाहिये क्योंकि वेद विरुद्ध और वेदों में अप्रसिद्ध के आचरण से बड़ा पाप होता है। ऐसी मर्यादा वेदों में लिखी है। इस हेतु से उक्त स्वामी जी हरिद्वार से लेकर सर्वत्र इसका खण्ड़न करते हुए काशी में आकर दुर्गाकुण्ड के समीप आनन्द बाग में स्थित हुए। उनके आने की धूम मची। बहुत से पण्डितों ने वेदों के पुस्तकों में विचार करना आरम्भ किया परन्तु पाषाणादि मूर्तिपूजा का विधान कहीं भी किसी को न मिला। बहुधा करके इसके पूजन में आग्रह बहुतों को है। इससे काशीराज महाराजा ने बहुत से पण्डितों को बुलाकर पूछा कि इस विषय में क्या करना चाहिये। तब सब ने ऐसा निश्चय करके कहा कि किसी प्रकार से दयानन्द स्वामी के साथ शास्त्रार्थ करके बहुकाल से प्रवित्त आचार को जैसे स्थापना हो सके करना चाहिये। निदान कार्तिक शुद्धि १२ सं. १९२६ मंगलवार को महाराजा काशी नरेश बहुत से पण्डितों को साथ लेकर जब स्वामी जी से शास्त्रार्थ करने के हेतु आए तब दयानन्द स्वामी जी ने महाराजा से पूछा कि आप वेदों की पुस्तक ले आए हैं वा नहीं? तब महाराजा ने कहा कि वेद सम्पूर्ण पण्डितों को कण्ठस्थ हैं। पुस्तकों का क्या प्रयोजन है? तब दयानन्द सरस्वती ने कहा कि पुस्तकों के बिना पूर्वापर प्रकरण का विचार ठीक-ठीक नहीं हो सकता। भला पुस्तक तो नहीं लाए? तो नहीं सही परन्तु किस विषय पर विचार होगा? तब पण्डितों ने कहा कि तुम मूर्तिपूजा का खण्डन करते हो, हम लोग उसका मण्डन करेंगे। पुनः स्वामी जी ने कहा कि जो कोई आप लोगों में मुख्य हो वही एक पण्डित मुझसे संवाद करे।
पण्डित रघुनाथ प्रसाद कोतवाल ने भी यह नियम किया कि स्वामी जी से एक-एक पण्डित विचार करे। सबसे पहिले ताराचरण नैयायिक स्वामी जी से विचार के हेतु सन्मुख प्रवृत्त हुए। स्वामी जी ने उनसे पूछा कि आप वेदों का प्रमाण मानते हैं वा नहीं? उन्होंने उत्तर दिया कि जो वर्णाश्रम में स्थित हैं उन सब को वेदों का प्रमाण ही है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि कहीं वेदों में पाषाण आदि मूर्तियों के पूजन का प्रमाण है वा नहीं, यदि है तो दिखाइये और जो न हो तो कहिये कि नहीं है। तब पं. ताराचरण ने कहा कि वेदों में प्रमाण है वा नहीं परन्तु जो एक वेदों का ही प्रमाण मानता है औरों का नहीं उसके प्रति क्या कहना चाहिये? स्वामी जी ने कहा कि औरों का विचार पीछे होगा। वेदों का विचार मुख्य है। इस निमित्त इसका विचार पहिले ही करना चाहिये क्योंकि वेदोक्त ही कर्म मुख्य है और मनुस्मृति आदि भी वेद मूलक हैं इससे इनका भी प्रमाण है क्योंकि जो वेद विरुद्ध और वेदों में अप्रसिद्ध है उनका प्रमाण नहीं होता। पं. ताराचरण ने कहा कि मनुस्मृति का वेदों में कहाँ मूल है? स्वामी जी ने कहा कि जो-जो मनु जी ने कहा है सो-सो औषधियों का भी औषध है ऐसा सामवेद के ब्राह्मण में कहा है। विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि रचना की अनुपत्ति होने से अनुमान प्रतिपाद्य प्रधान जगत् का कारण नहीं। व्यास जी के इस सूत्र का वेदों में क्या मूल है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यह प्रकरण से भिन्न बात है। इस पर विचार करना न चाहिये। फिर विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि यदि तुम जानते हो तो अवश्य कहो। इस पर स्वामी जी ने यह समझकर कि प्रकरणान्तर में वार्ता जारी रहेगी इससे न कहा और कह दिया कि जो कदाचित् किसी को कण्ठ न हो तो पुस्तक देखकर कहा जा सकता है। तब विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा जो कण्ठस्थ नहीं है तो काशी नगर में शास्त्रार्थ करने को क्यों उद्यत हुए। इस पर स्वामी जी ने कहा क्या आपको सब कण्ठाग्र है? विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि हाँ हमको सब कण्ठस्थ है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि कहिये धर्म का क्या स्वरूप है? विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि जो वेद प्रतिपाद्य फल सहित अर्थ है वही धर्म कहलाता है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यह आपकी संस्कृत है। इसका क्या प्रमाण है। श्रुति वा स्मृति से कहिये। विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा जो चोदना लक्षण अर्थ है सो धर्म कहलाता है। यह जैमिनि का सूत्र है। स्वामी जी ने कहा कि यह तो सूत्र है, यहाँ श्रुति वा स्मृति को कण्ठ से क्यों नहीं कहते? और चोदना नाम प्रेरणा का है वहाँ भी श्रुति वा स्मृति कहना चाहिये जहाँ प्रेरणा होती है। जब इसमें विशुद्धानन्द स्वामी ने कुछ भी न कहा तब स्वामी जी ने कहा कि अच्छा आपने जो धर्म का स्वरूप तो न कहा परन्तु धर्म के कितने लक्षण हैं कहिये। विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि धर्म का एक ही लक्षण है। स्वामी जी ने कहा कि मनुस्मृति में तो धर्म के दस लक्षण हैं- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध- फिर कैसे कहते हो कि एक ही लक्षण है। तब बाल शास्त्री ने कहा कि हमने सब धर्मशास्त्र देखा है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि आप अधर्म का लक्षण कहिये तब बाल शास्त्री जी ने कुछ उत्तर न दिया फिर बहुत से पण्डितों ने इकट्ठे हल्ला करके पूछा कि वेद में प्रतिमा शब्द है वा नहीं? इस पर स्वामी जी ने कहा कि प्रतिमा शब्द तो है। उन लोगों ने कहा कि कहाँ पर है? स्वामी जी ने कहा कि सामवेद के ब्राह्मण में है। फिर उन लोगों ने कहा कि वह कौनसा वचन है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यह है देवता के स्थान कंपायमान होते और प्रतिमा हंसती है इत्यादि। फिर उन लोगों ने कहा कि प्रतिमा शब्द तो वेदों में भी है फिर आप कैसे खण्डन करते हैं। इस पर स्वामी जी ने कहा कि प्रतिमा शब्द से पाषाणादि मूर्ति पूजनादि का प्रमाण नहीं हो सकता है। इसलिए प्रतिमा शब्द का अर्थ करना चाहिये कि इसका क्या अर्थ है। तब उन लोगों ने कहा कि जिस प्रकरण में यह मन्त्र है उस प्रकरण का क्या अर्थ है? इस पर स्वामी जी ने कहा कि यह अर्थ है अथ अद्भुत शान्ति की व्याख्या करते हैं ऐसा प्रारम्भ करके फिर रक्षा करने के लिए इन्द्र इत्यादि सब मूल मन्त्र वहीं सामवेद के ब्राह्मण में लिखे हैं। इनमें से प्रति मन्त्र करके तीन-तीन हजार आहुति करनी चाहिये इसके अनन्तर व्याहृति करके पाँच-पाँच आहुति करनी चाहिये । ऐसा करके सामगान भी करना लिखा है। इस क्रम करके अद्भुत शान्ति का विधान किया है। जिस मन्त्र में प्रतिमा शब्द है सो मन्त्र मृत्यु लोक विषयक नहीं है किन्तु ब्रह्म लोक विषयक है सो ऐसा है कि जब विघ्नकर्ता देवता पूर्व दिशा में वर्तमान होवे इत्यादि मन्त्रों से अद्भुत दर्शन की शान्ति कहकर फिर दक्षिण दिशा पश्चिम दिशा और उत्तर दिशा इसके अनन्तर भूमि की शान्ति कहकर मृत्युलोक का प्रकरण समाप्त कर अन्तरिक्ष की शान्ति कहके इसके अनन्तर स्वर्ग लोक फिर परम स्वर्ग अर्थात् ब्रह्म लोक की शान्ति कही है। इस पर सब चुप रहे। फिर बालशास्त्री ने कहा कि जिस-जिस दिशा में जो-जो देवता है उस-उस की शान्ति करने से अद्भुत देखने वालों के विघ्नों की शान्ति होती है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यह तो सत्य है परन्तु इस प्रकरण में विघ्न दिखाने वाला कौन है? तब बाल शास्त्री ने कहा कि इन्द्रियाँ देखने वाली हैं। इस पर स्वामी जी ने कहा कि इन्द्रियाँ तो देखने वाली हैं, दिखाने वाली नहीं ‘स प्राचीं दिशमन्ववर्तते ’ मन्त्र में ‘स’ शब्द का वाच्यार्थ क्या है? तब बाल शास्त्री जी ने कुछ न कहा, फिर पण्डित शिवसहाय जी ने कहा कि अन्तरिक्ष आदि गमन शान्ति करने का फल इस मन्त्र का अर्थ कहा जाता है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि आपने वह प्रकरण देखा है तो किसी मन्त्र का अर्थ तो कहिये। तब शिवसहाय जी चुप ही रहे। फिर विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि वेद किससे उत्पन्न हुए हैं? इस पर स्वामी जी ने कहा कि वेद ईश्वर से उत्पन्न हुए हैं। विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि किस ईश्वर से? क्या न्याय शास्त्र प्रसिद्ध ईश्वर से वा योग शास्त्र प्रसिद्ध ईश्वर से अथवा वेदान्त शास्त्र प्रसिद्ध ईश्वर से इत्यादि। इस पर स्वामी जी ने कहा कि क्या ईश्वर बहुत से हैं? तब विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि ईश्वर तो एक ही है परन्तु वेद कौन से लक्षण वाले ईश्वर से प्रकाशित भये हैं? इस पर स्वामी जी ने कहा कि सच्चिदानन्द लक्षण वाले ईश्वर से प्रकाशित भये हैं। फिर विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा ईश्वर और वेदों में क्या सम्बन्ध है? क्या प्रतिपाद्य प्रतिपादक भाव वा जन्य जनक भाव अथवा समवाय भाव अथवा सेवक स्वामी भाव अथवा तादात्मय सम्बन्ध है इत्यादि। इस पर स्वामी जी ने कहा कार्य्य कारण भाव सम्बन्ध है। फिर विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि जैसे मन में ब्रह्म बुद्धि और सूर्य्य में ब्रह्म बुद्धि करके प्रतीक उपासना कही है वैसे ही सालिग्राम का पूजन भी ग्रहण करना चाहिये। इस पर स्वामी जी ने कहा जैसे ‘मनोब्रह्मेत्युपासीत’ आदित्य ब्रह्मेत्युपासीत इत्यादि वचन वेद में देखने में आते हैं वैसे ‘पाषाणादि ब्रह्मेत्युपासीत’ आदि वचन वेद में कहीं नहीं दीख पड़ते, फिर क्यों कर इसका ग्रहण हो सकता है? तब पण्डित माधवाचार्य ने कहा- ‘उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजाग्रहि त्वमिष्टापूर्ते इति’ इस मन्त्र में ‘पूर्ते’ शब्द से किसका ग्रहण है? इस पर स्वामी जी ने कहा वायी, कूप, तड़ाग और आराम का ही ग्रहण है। माधवाचार्य ने कहा कि इससे पाषाणादि मूर्तिपूजन क्यों नहीं ग्रहण होता है? इस पर स्वामी जी ने कहा कि पूर्ति शब्द पूर्ति का वाचक है। इससे कदाचित् पाषाणादि मूर्तिपूजन का ग्रहण नहीं हो सकता। यदि शंका हो तो इस मन्त्र का निरुक्त और ब्राह्मण देखिये। तब माधवाचार्य ने कहा कि पुराण शब्द वेदों में है वा नहीं? इस पर स्वामी जी ने कहा कि पुराण शब्द तो बहुत सी जगह वेदों में है पुराण शब्द से ब्रह्म वैवतादिक ग्रन्थों का कदाचित् ग्रहण नहीं हो सकता क्योंकि पुराण शब्द भूतकाल वाची है और सर्वत्र द्रव्य का विशेषण ही होता है। फिर विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि बृहदारण्यकोपनिषद् के इस मन्त्र में कि – ‘‘एतस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं श्लोका व्याख्यानुव्याख्यानानीति’’ यह सब जो पठित है इसका प्रमाण है वा नहीं। इस पर स्वामी जी ने कहा कि हाँ प्रमाण है फिर विशुद्धानन्द जी ने कहा कि जो श्लोक का भी प्रमाण है तो सबका प्रमाण आया। इस पर स्वामी जी ने कहा कि सत्य श्लोकों का प्रमाण होता है औरों का नहीं। तब विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि यहाँ पुराण शब्द किस का विशेषण है? इस पर स्वामी जी ने कहा कि पुस्तक लाइये तब इसका विचार हो। पं. माधवाचार्य ने वेदों के दो पत्रे निकाले और कहा कि यहाँ पुराण शब्द किसका विशेषण है? स्वामी जी ने कहा कि कै सा वचन है, पढिये। तब माधवाचार्य ने यह पढ़ा ‘ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानीति’। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यहाँ पुराण शब्द ब्राह्मण का विशेषण है अर्थात् पुराने नाम सनातन ब्राह्मण हैं। तब पण्डित बालशास्त्री जी आदि ने कहा कि क्या ब्राह्मण कोई नवीन भी होते हैं? इस पर स्वामी जी ने कहा कि नवीन ब्राह्मण नहीं हैं परन्तु ऐसी शंका भी किसी को न हो इसलिये यहाँ यह विशेषण कहा है। तब विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि यहाँ इतिहास शब्द के व्यवधान होने से कैसे विशेषण होगा। इस पर स्वामीजी ने कहा कि क्या ऐसा नियम है कि व्यवधान से विशेषण नहीं हो सकता और अव्यवधान ही में होता है क्योंकि ‘अजो नित्यश्शाश्वतोऽयम्पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ इस श्लोक में दूरस्थ देही का भी विशेषण नहीं है? और कहीं व्याकरणादि में भी यह नियम नहीं किया है कि समीपस्थ ही विशेषण होते हैं, दूरस्थ नहीं। तब विशुद्धानन्द स्वामी जी ने कहा कि यहाँ इतिहास का तो पुराण शब्द विशेषण नहीं है इससे क्या इतिहास नवीन ग्रहण करना चाहिये। इस पर स्वामी जी ने कहा कि और जगह पर इतिहास का विशेषण पुराण शब्द है। सुनिये! इतिहास पुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः इत्यादि में कहा है। तब वामनाचार्य आदिकों ने कहा कि वेदों में यह पाठ ही कहीं भी नहीं है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि यदि वेदों में यह पाठ न होवे तो हमारा पराजय हो और जो हो तो तुम्हारा पराजय हो। यह प्रतिज्ञा लिखो, तब सब चुप ही रहे। इस पर स्वामी जी ने कहा कि व्याकरण जानने वाले इस पर कहें कि व्याकरण में कहीं कल्मसंज्ञा करी है वा नहीं। तब बालशास्त्री ने कहा कि संज्ञा तो नहीं की है परन्तु एक सूत्र में भाष्यकार ने उपहास किया है। इस पर स्वामी जी ने कहा कि किस सूत्र के महाभाष्य में संज्ञा तो नहीं की और उपहास किया है, यदि जानते हो तो इसके उदाहरण पूर्वक समाधान कहो। बाल शास्त्री और औरों ने कुछ भी न कहा। माधवाचार्य ने दो पत्रे वेदों के निकालकर सब पण्डितों के बीच में रख दिये और कहा कि यहाँ यज्ञ के समाप्त होने पर यजमान दसवें दिन पुराणों का पाठ सुने ऐसा लिखा है। यहाँ पुराण शब्द किसका विशेषण है? स्वामी जी ने कहा कि पढ़ो इसमें किस प्रकार का पाठ है। जब किसी ने पाठ न किया तब विशुद्धानन्द जी ने पत्रे उठा के स्वामी जी के ओर करके कहा कि तुम ही पढ़ो। स्वामी जी- आप ही इसका पाठ कीजिये। तब विशुद्धानन्द स्वामी ने कहा कि मैं ऐनक के बिना पाठ नही कर सकता। ऐसा कहके वे पत्रे उठाकर विशुद्धानन्द स्वामी जी ने दयानन्द स्वामी जी के हाथ में दिये। इस पर स्वामी जी दोनों पत्रे लेकर विचार करने लगे। इसमें अनुमान है कि पांच पल व्यतीत हुए होंगे कि ज्यों ही स्वामी जी यह उत्तर कहा चाहते थे कि ‘‘पुरानी जो विद्या है उसे पुराण विद्या कहते हैं और जो पुराण विद्या वेद है वहीं पुराण विद्या वेद कहाता है, इत्यादि से यहाँ ब्रह्मविद्या ही का ग्राह्य है क्योंकि पूर्व प्रकरण में ऋग्वेदादि चारों वेद आदि का तो श्रवण कहा है परन्तु उपनिषदों का नहीं कहा। इसलिये यहाँ उपनिषदों का ही ग्रहण है औरों का नहीं। पुरानी विद्या वेदों की ही ब्रह्म विद्या है इससे ब्रह्मवैवर्तादि नवीन ग्रन्थों का ग्रहण कभी नहीं कर सकते क्योंकि जो वहाँ ऐसा पाठ होता कि ब्रह्मवैवर्तादि १८ अन्य पुराण है सो तो वेद में कही ऐसा पाठ नहीं है। इसलिये कदाचित् अठारहों का ग्रहण नहीं हो सकता’’ ज्यों ही यह उत्तर कहना चाहते थे कि विशुद्धानन्द स्वामी उठ खड़े हुए और कहा कि हमको विलम्ब होता है। हम जाते हैं। तब सबके सब उठ खड़े हुए और कोलाहल करते हुए चले गए। इस अभिप्राय से कि लोगों पर विदित हो कि दयानन्द स्वामी का पराजय हुआ परन्तु जो दयानन्द स्वामी के चार पूर्वोक्त प्रश्न हैं उनका वेद में तो प्रमाण ही न निकला फिर क्यों कर उनका पराजय हुआ?
अर्थात् मूर्ति पूजा का कहीं वेदों में वर्णन नहीं है।
आज इतिहास के कुछ ऐसे पृष्ठ पलटेंगे जिन पर स्त्री, पुरुषों और बच्चों के साथ साथ मन्दिर और मूर्तियों पर भी अत्याचार हुए लिखे हैं। लेकिन किसी भी मूर्ति ने अत्याचारियों की टांग तक नही तोड़ी।
भारत में 7वीं सदी के प्रारम्भ में मुस्लिम आक्रान्ताओं का आक्रमण प्रारम्भ हुआ था। यहां उन्होंने सोना-चांदी आदि दौलत लूटने और इस्लामिक शासन की स्थापना करने के उद्देश्य से आक्रमण किए। 7वीं से लेकर 16वीं सदी तक लगातार हजारों हिन्दू, जैन और बौद्ध मन्दिरों को तोड़ा और लूटा गया। यहां उनकी संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं –
० अनन्तनाग, कश्मीरका मार्तण्ड सूर्य मन्दिर मुस्लिम शासक सिकन्दर बुतशिकन ने तुड़वाया था।
० पाटन, गुजरात का मोढेरा सूर्य मन्दिर
मुस्लिम आक्रान्ता अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान इस मन्दिर को काफी नुकसान पहुंचा था। यहां पर उसने लूटपाट की और मन्दिर की अनेक मूर्तियों को खण्डित कर दिया।
० काशी, उ०प्र० के विश्वनाथ मन्दिर को 1194 में मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इसे फिर से बनाया गया, लेकिन एक बार फिर इसे सन् 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह द्वारा तोड़ दिया गया। फिर से बनाया गया। औरङ्गजेब के आदेश पर यहां का मन्दिर तोड़कर एक ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। 2 सितंबर 1669 को औरङ्गजेब को मन्दिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। औरङ्गजेब ने प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था। आज उत्तरप्रदेश के 90 प्रतिशत मुसलमानों के पूर्वज ब्राह्मण हैं।
० मथुरा, उ०प्र० में कृष्ण जन्मभूमि मन्दिर को
औरङ्गजेब ने तुड़वाकर ईदगाह बनवाई थी। इस मन्दिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मन्दिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था जिसे 16वीं शताब्दी के आरम्भ में सिकन्दर लोदी ने नष्ट करवा डाला।
० अयोध्या, उ० प्र० का राम जन्मभूमि मन्दिर को
इतिहासकारों के अनुसार 1528 में बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या में राम मन्दिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। बाबर एक तुर्क था। उसने बर्बर तरीके से हिन्दुओं का कत्लेआम कर अपनी सत्ता कायम की थी। मन्दिर तोड़ते वक्त 10,000 से ज्यादा हिन्दू उसकी रक्षा में मारे गए थे।
० काठियावाड़, गुजरात का सोमनाथ मन्दिर को पहली बार 725 ईस्वी में सिन्ध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वा दिया था। फिर प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका पुनर्निर्माण करवाया। इसके बाद महमूद गजनवी ने सन् 1024 में कुछ 5,000 साथियों के साथ सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया। तब मन्दिर की रक्षा के लिए निहत्थे हजारों लोग मारे गए थे। ये वे लोग थे, जो पूजा कर रहे थे या मन्दिर के अन्दर दर्शन लाभ ले रहे थे और जो गांव के लोग मन्दिर की रक्षा के लिए निहत्थे ही दौड़ पड़े थे। सन् 1297 में जब दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां ने गुजरात पर हमला किया तो उसने सोमनाथ मन्दिर को दुबारा तोड़ दिया और सारी धन-सम्पदा लूटकर ले गया। मन्दिर को फिर से हिन्दू राजाओं ने बनवाया। लेकिन सन् 1395 में गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने मन्दिर को फिर से तुड़वाकर सारा चढ़ावा लूट लिया। इसके बाद 1412 में उसके पुत्र अहमद शाह ने भी यही किया। बाद में मुस्लिम क्रूर बादशाह औरङ्गजेब के काल में सोमनाथ मन्दिर को दो बार तोड़ा गया- पहली बार 1665 ईस्वी में और दूसरी बार 1706 ईस्वी में। 1665 में मन्दिर तुड़वाने के बाद जब औरङ्गजेब ने देखा कि हिन्दू उस स्थान पर अभी भी पूजा-अर्चना करने आते हैं तो उसने वहां एक सैन्य टुकड़ी भेजकर कत्लेआम करवाया।
० सिन्ध के राजा दाहिर का इतिहास जानकर आपको अन्दाजा लगाना आसान होगा कि अन्ध विश्वास ने भारत का कितना बड़ा विनाश किया है।
राजा दाहिर ने ३०,००० सैनिको सहित मुहम्मद बिन कासिम का डटकर मुकाबला किया। घमासान युद्ध हुआ। रणक्षेत्र लाशों से पट गया। शत्रु के छक्के छूट गए और घुटने टूट गए। कासिम का साहस जवाब दे गया। वह पीठ दिखा और सर पर पैर रखकर भागने वाला था कि एक देशद्रोही, नीच पुजारी कासिम से जा मिला। उसने कहा कि यदि आप मेरी रक्षा करें और मुझे दक्षिणा दें तो मैं देवल की पराजय और आपकी विजय का रहस्य
बता सकता हूँ। कासिम बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला- “बहुत अच्छा, बताओ”। तब पुजारी ने उसे बताया कि सामने मंदिर के शिखर पर जो ध्वज लगा हुआ है उसे गिरा दिया जाये तो हिन्दुओ की कमर टूट जायेगी, वे समझ लेंगे कि देवता अप्रसन्न हो गए है और युद्ध करना बन्द कर देंगे। कासिम ने कहा-“वहा तो कड़ा पहरा है, चिड़िया भी वहाँ पर नहीं मार सकती, ऐसी स्थिति
में झंडे को कैसे गिराया जा सकता है?” पुजारी ने कहा-“यह कार्य तो मैं कर दूंगा, मैं इस मन्दिर का पुजारी हूँ। रात्रि में इस ध्वज को मैं गिरा दूंगा।” प्रातः काल जब दाहिर की रण के लिए उद्यत सेना को मन्दिर की चोटी पर झण्डा दिखाई नहीं दिया तो उनका उत्साह और साहस मन्द हो गया। पुजारी द्वारा मचाया गये शोर से भी उन्होंने समझ लिया कि देवता अप्रसन्न हो गए है, अब हमारी पराजय निश्चित है। सेना निराश होकर भागने लगी, राजा दाहिर घायल होकर गिर पड़ा, उसका सिर काटकर एक भाले पर टांग दिया गया। हजारों स्त्री पुरुषों को मौत के घात उतारा गया। उस मन्दिर को तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद बनाई गई। उसी नीच पुजारी ने कासिम के पास आकर कहा-“ देखिये मैंने आपकी विजय कराई है। यदि आप मुझे इच्छानुसार उत्तम भोजन कराये तो मैं आपको एक गुप्त खजाने का पता भी बता सकता हूँ। कासिम ने उसे खूब भोजन खिलाया। तब वह पुजारी उसे एक ऐसे तहखाने में ले गया जहां राज्य का पूरा खजाना सुरक्षित था। उस तहखाने में ताँबे की ४० देग रखी थी जिनमें १७,२०० मन सोना भरा था। इन देगों के अतिरिक्त सोने की बनी हुई ६,००० मूर्तियाँ थी जिनमें सबसे बड़ी मूर्ति का वजन ३० मन था। हीरा, पन्ना, माणिक और मोती तो इतने थे कि उन्हें कई ऊँटो पर लादकर ले जाया गया। ये है मूर्तिपूजा का अभिशाप। यदि हिन्दुओं का मूर्तियों में अन्धविश्वास ना होता तो भारत को ये दुर्दिन ना देखने पड़ते।
= आज भी हमारे देशभर में जो धर्म के ठेकेदार हैं उन्हें धर्म का ज्ञान नही है अन्ध विश्वास फैलाते रहते हैं।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज के शब्दों में- “मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं किन्तु अन्धकार की एक बहुत बड़ी खाई है जिसमें गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है।”
० पूजा क्या है ? पूजा कैसे करें ? इस बात को जानने से पूर्व यह जानना अत्यावश्यक है कि पूजा किसकी करें ?
० पूजा “देव” की ही की जाती है। लेकिन देव कौन है इसकी जानकारी समाज में अधिकांश को नहीं है। समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो पाषाणादि मूर्तियों को देव मानते हैं माता-पिता या आचार्यादि को देव नही मानते जबकि पाणाषादि की मूर्ति को देव मानना सैद्धान्तिक रूप से सही नहीं है।
० आज हम यह चर्चा करेंगे कि देव शब्द के अन्तर्गत कौन कौन आयेगा अर्थात् देव शब्द किस किस के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
० सर्व प्रथम देव शब्द परमेश्वर के लिए प्रयोग किया जाता है महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज कहते है गुण कर्मों के आधार पर परमेश्वर के अनेक नाम हैं उनमें से परमेश्वर का एक नाम देव भी है-
“दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु” इस धातु से ‘देव’ शब्द सिद्ध होता है। (क्रीडा) जो शुद्ध जगत् को क्रीडा कराने (विजिगीषा) धार्मिकों को जिताने की इच्छायुक्त (व्यवहार) सब चेष्टा के साधनोपसाधनों का दाता (द्युति) स्वयंप्रकाशस्वरूप, सब का प्रकाशक (स्तुति) प्रशंसा के योग्य (मोद) आप आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द देनेहारा (मद) मदोन्मत्तों का ताड़नेहारा (स्वप्न) सब के शयनार्थ रात्रि और प्रलय का करनेहारा (कान्ति) कामना के योग्य और (गति) ज्ञानस्वरूप है, इसलिये उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।
अथवा
‘यो दीव्यति क्रीडति स देवः’ जो अपने स्वरूप में आनन्द से आप ही क्रीडा करे अथवा किसी के सहाय के विना क्रीडावत् सहज स्वभाव से सब जगत् को बनाता वा सब क्रीडाओं का आधार है।
‘विजिगीषते स देवः’ जो सब का जीतनेहारा, स्वयम् अजेय अर्थात् जिस को कोई भी न जीत सके।
‘व्यवहारयति स देवः’ जो न्याय और अन्यायरूप व्यवहारों का जनाने और उपदेष्टा।’
‘यश्चराचरं जगत् द्योतयति’ जो सब का प्रकाशक।
‘यः स्तूयते स देवः’ जो सब मनुष्यों को प्रशंसा के योग्य और निन्दा के योग्य न हो।
‘यो मोदयति स देवः’ जो स्वयम् आनन्दस्वरूप और दूसरों को आनन्द कराता, जिस को दुःख का लेश भी न हो।
‘यो माद्यति स देवः’ जो सदा हर्षित, शोक रहित और दूसरों को हर्षित करने और दुःखों से पृथक् रखनेवाला।
‘यः स्वापयति स देवः’ जो प्रलय समय अव्यक्त में सब जीवों को सुलाता।
‘यः कामयते काम्यते वा स देवः’ जिस के सब सत्य काम और जिस की प्राप्ति की कामना सब शिष्ट करते हैं।
‘यो गच्छति गम्यते वा स देवः’ जो सब में व्याप्त और जानने के योग्य है,
इस से उस परमेश्वर का नाम ‘देव’ है।
अर्थात् देव शब्द से प्रथम परमेश्वर का ही ग्रहण करना चाहिए [ प्रकरणानुसार देव शब्द से अन्य किन-किन पदार्थों का ग्रहण होगा यह आगे लिखेंगे ]
जैसे – विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव … मन्त्र में देव का अर्थ परमेश्वर लिया गया है।
० एक प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या सर्वत्र देव शब्द से परमेश्वर का ही ग्रहण होगा ?
इसके उत्तर में महर्षि यास्क का विचार चिन्तनीय है – ‘देव’ शब्द के अनेक अर्थ हैं – ” देवो दानाद् वा , दीपनाद् वा , द्योतनाद् वा , द्युस्थानो भवतीति वा | ” ( निरुक्त – ७ / १५ ) तदनुसार ‘देव’ का लक्षण है ‘दान’ अर्थात देना | जो सबके हितार्थ दान दे , वह देव है | देव का गुण है ‘दीपन’ अर्थात प्रकाश करना | सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं | देव का कर्म है ‘द्योतन’ अर्थात सत्योपदेश करना | जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है | देव की विशेषता है ‘द्युस्थान’ अर्थात ऊपर स्थित होना | ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को , समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को देव कहते हैं | इस प्रकार ‘देव’ शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है |
उपरोक्त परिभाषा के अनुसार देव शब्द से किस किस का ग्रहण होगा इस पर “सत्यार्थ प्रकाश” में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा –
मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव अतिथिदेवो भव॥ (तैत्तिरीयोपनिषद)
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवरैस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः॥
पूज्यो देववत्पतिः।। (मनुस्मृति)
प्रथम माता मूर्त्तिमती पूजनीय देवता, अर्थात् सन्तानों को तन, मन, धन से सेवा करके माता को प्रसन्न रखना, हिंसा अर्थात् ताड़ना कभी न करना। दूसरा पिता सत्कर्त्तव्य देव। उस की भी माता के समान सेवा करनी॥
तीसरा आचार्य जो विद्या का देने वाला है उस की तन, मन, धन से सेवा करनी॥
चौथा अतिथि जो विद्वान्, धार्मिक, निष्कपटी, सब की उन्नति चाहने वाला जगत् में भ्रमण करता हुआ, सत्य उपदेश से सब को सुखी करता है उस की सेवा करें॥
पांचवां स्त्री के लिये पति और पुरुष के लिये स्वपत्नी पूजनीय है॥
ये पांच मूर्त्तिमान् देव जिन के संग से मनुष्यदेह की उत्पत्ति, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश की प्राप्ति होती हैं ये ही परमेश्वर को प्राप्ति होने की सीढ़ियां हैं। इन की सेवा न करके जो पाषाणादि मूर्त्ति पूजते हैं वे अतीव पामर, नरकगामी तथा वेदविरोधी हैं।
मनुष्यों में पांच देव होते है – माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पति/पत्नि (अर्थात् पति के लिए पत्नि और पत्नि के लिए पति)।
० इनके अतिरिक्त ३३ प्रकार के देव और होते हैं – महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में इस प्रकार लिखते हैं ‘त्रयस्त्रिंशत् त्रिशता॰’ इत्यादि वेदों में प्रमाण हैं इस की व्याख्या शतपथ में की है कि तेंतीस देव अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्र सब सृष्टि के निवास स्थान होने से आठ वसु।
प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और जीवात्मा ये ग्यारह रुद्र इसलिये कहाते हैं कि जब शरीर को छोड़ते हैं तब रोदन कराने वाले होते हैं।
संवत्सर के बारह महीने बारह आदित्य इसलिये हैं कि ये सब की आयु को लेते जाते हैं।
बिजली का नाम इन्द्र इस हेतु से है कि परम ऐश्वर्य का हेतु है।
यज्ञ को प्रजापति कहने का कारण यह है कि जिस से वायु वृष्टि जल ओषधी की शुद्धि, विद्वानों का सत्कार और नाना प्रकार की शिल्पविद्या से प्रजा का पालन होता है।
ये तेंतीस पूर्वोक्त गुणों के योग से देव कहाते हैं। इन का स्वामी और सब से बड़ा होने से परमात्मा चौंतीसवां उपास्यदेव शतपथ के चौदहवें काण्ड में स्पष्ट लिखा है।
=> ध्यान दें –
उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट होता है कि-
० परमेश्वर हमारा प्रथम देव है।
० मनुष्यों में पांच देव होते हैं- माता, पिता, आचार्य, अतिथि तथा पति/पत्नी
० ३३ प्रकार के देव और होते हैं –
८ वसु
११ रुद्र
१२ आदित्य
१ इन्द्र
१ प्रजापति
पिछली चर्चा में हमने जाना कि देव शब्द से किस किस का ग्रहण होता है।
० परमेश्वर हमारा प्रथम देव है।
० मनुष्यों में पांच देव होते हैं – माता, पिता, आचार्य, अतिथि तथा पति/पत्नी
० ३३ प्रकार के देव – ११ रुद्र, १२ आदित्य, ८ वसु, १ इन्द्र और १ प्रजापति। ( इन ३३ में ३२ जड़ देव हैं और १ आत्मा चेतन देव है।
उपरोक्त देवों के अतिरिक्त कोई देव नही है।
मेरा प्रवचन कार्यक्रम एक बार पूना में चलरहा था तो वहां एक प्रश्न किया गया कि क्या विष्णु नामक देवता नही होता? क्योंकि आपने उसका कोई वर्णन अपनी चर्चा में नही किया।
ध्यान देंगे इस प्रश्न जैसे ही और भी अनेक प्रश्न हो सकते हैं , क्योंकि समाज में कितने ही देवताओं की बाढ जैसी आयी हुई है नये नये देवता पनपते रहते हैं।
उपरोक्त प्रश्न को ठीक ठीक समझने के लिए पहले सिद्धान्त की एक बात जानते हैं कि
प्रश्न – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनादि, अविनाशी तत्व कितने हैं ?
उत्तर – अनादि, अविनाशी तत्व तीन हैं – ईश्वर, जीव और प्रकृति ।
प्रश्न – क्या इन तीनों के अतिरिक्त कोई चौथा भी तत्व है या हो सकता है ?
उत्तर – इन तीनों ( ईश्वर, जीव और प्रकृति) से अलग कोई चौथा तत्व नहीं है और ना ही हो सकता है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड इन्हीं तीनों से बनता है – ईश्वर ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण प्रकृति से करता है और जीव के भोग और अपवर्ग के लिए।
ऊपर लिखे सभी देव इन तीनों में से ही हैं
० ईश्वर = ईश्वर ( जो कि प्रथम देव हैं)
० जीव = माता, पिता, आचार्य, अतिथि तथा पति/पत्नी ( मनुष्यों में पांच देव सब जीव ही तो हैं) और ३३ में से एक आत्मा।
० प्रकृति = १० रुद्र ( ११वां आत्मा चेतन है जो कि जीव में गिन लिया गया है), १२ आदित्य, ८ वसु, १ इन्द्र ( विद्युत), तथा १ प्रजापति (यज्ञ)।
आपने देखा कि सभी देवता तीन में ही सिमट गये । ऐसा समझने पर आपके देवता सम्बन्धी सभी प्रश्न हल हो जायेंगे।
जैसे विष्णु कौन है? अब पहले हम यह जाने कि विष्णु नामक देव है तो वह इन्ही तीनों( ईश्वर, जीव और प्रकृति) में से ही होना चाहिए क्योंकि चौथा तो अस्तित्व होता ही नहीं है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में लिखते हैं –
“विष्लृ व्याप्तौ” इस धातु से ‘नु’ प्रत्यय होकर ‘विष्णु’ शब्द सिद्ध हुआ है। ‘वेवेष्टि व्याप्नोति चराऽचरं जगत् स विष्णुः’ चर और अचररूप जगत् में व्यापक होने से परमात्मा का नाम ‘विष्णु’ है। अर्थात् ईश्वर ही विष्णु है लेकिन यहां इस बात का ध्यान अवश्य देना होगा कि वह ऐसे स्वरूप वाला नही है जैसा लोगों ने चित्र बना रखा है क्योंकि ईश्वर निराकार है ,उसका चित्र नही बनाया जा सकता , विष्णु का जो स्वरूप समाज में है वह काल्पनिक है सत्य नहीं ।
इसीप्रकार अन्यत्र समझें।
प्रवचन की यात्रा में एक प्रश्न बार बार आता है आइये उसका भी यहां उल्लेख करते हैं –
क्या मरने के बाद व्यक्ति देव बन जाता है? बहुत लोग उनके थान बनाकर या कब्रों को देव समझ कर पूजते हैं।
आइये पहले हम यह समझते हैं कि आत्मा मरने के बाद ( शरीर छोड़ने के बाद ) कहां जाता है ? क्योंकि आत्मा एक अविनाशी तत्व है वह न जन्म लेता है और ना ही मरता है आत्मा और शरीर के संयोग का नाम जन्म है, आत्मा और शरीर का साथ साथ चलना जीवन है तथा आत्मा और शरीर के वियोग का नाम ही मृत्यु है ।
शरीर छोड़कर आत्मा परमेश्वर की व्यवस्था में चली जाती है । जब तक नया शरीर नही मिलता तब तक आत्मा अति सुषुप्त अवस्था में रहती है । आत्मा को अपना भी ज्ञान नही होता कि कहां हैं। आत्मा का पुराने सम्बन्धियों से भी कोई सम्बन्ध नही रहता। यहां एक बात और जानना अत्यावश्यक है आत्मा ही कर्ता है और आत्मा ही भोक्ता है लेकिन शरीर रूपी साधन के बिना नही । अर्थात् बिना शरीर के आत्मा कोई कार्य नही करता। इन बातों से यह समझना आसान है कि आत्मा शरीर छोड़कर जाने के बाद उससे हमारा कोई सम्बन्ध नही रहता और हम उस आत्मा से कोई सम्पर्क भी नहीं कर सकते ।अतः थान और कब्र आदि पूजा निरर्थक है।
पूजा क्या है ? पूजा कैसे करें ?
पूजा क्या है ?
पूजा कैसे करें ?
आइए आज इन प्रश्नों पर विचार करेंगे।
पूजा = पूज् + “चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्च्चश्च” इति अङ् । ततष्टाप्। पूजायां सत्कारः अर्थात् पूजा शब्द का अर्थ के सत्कार करना ।
यहां हम विचार करेंगे कि पूजा शब्द जहां जहां प्रयोग हो वहां वहां सत्कार करना , सम्मान करना , सेवा करना , यथायोग्य व्यवहार करना ऐसा समझना चाहिए
आज कल पूजा का विकृत स्वरूप देखने को मिलता है जैसे पत्थर या धातु आदि की बनी हुई मूर्ति को तिलक लगाना, धूप दिखाना, भोग लगाना, वस्त्र पहनाना आदि ।
पूजा शब्द का व्यावहारिक प्रयोग देखिए कोई कहता है हम अभी पेट पूजा करेंगे इसका अभिप्राय यह है कि वह भोजन करने वाला है। न कि वह पेट पर टीका लगायेगा।
पूर्व की चर्चा में हम देवों का वर्णन कर चुकें हैं । आइए उनकी पूजा कैसे करें इस पर विचार करते हैं –
हमारा प्रथम देव परमेश्वर है तो परमेश्वर पर पूर्ण विश्वास करना, परमेश्वर की आज्ञा पालन करना, परमेश्वर की उपासना करना, प्राणी मात्र का हित करना अर्थात् परोपकार करना ही ईश्वर पूजा है वेद मन्त्रों से परमेश्वर की स्तुति करना भी ईश्वर की पूजा है।
पूजक – पूजा करने वाला
पूज्य – पूजा के योग्य ( देव )
पूजा की सामग्री – देव के सत्कार के लिए उपयुक्त सामग्री
परमेश्वर की भेंट में प्रस्तुत करने का ऐसा कोई सामान हमारे पास नही है जिसे सेवा में लाया जा सके इसीलिए स्वयं को परमेश्वर की व्यवस्था में लगाना ही परमेश्वर की पूजा है । परमेश्वर की उपासना की जाती है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज पूना प्रवचन में कहते हैं – ” पूजा शब्द का अर्थ सत्कार है । अब देव को पूजा कहने से परमात्मा का सत्कार करना यह अर्थ होता है, चेतन पदार्थों का ही केवल सत्कार सम्भावित है जड़ पदार्थों का अर्थात् मूर्तियों का सत्कार सम्भव नही होता, मुख्य तत्व से वेद मन्त्र के पठन से ईश्वर का सत्कार होता है, इसीलिए प्राचीन आर्य लोगों ने होम के स्थल में मन्त्रों की योजना की है, इसी तरह यज्ञशाला को देवायतन अथवा देवालय कहा है।
इस कथन से अर्वाचीन देवालय अर्थात् मन्दिरों को कोई न समझे, देवालय का अर्थ तो यज्ञशाला ही है।”
मनुष्यों में पांच देव हैं – माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पति /पत्नी इनका सत्कार करना पूजा है।
अर्थात् माता – पिता ( माता – पिता के समान ताऊ-ताई, चाचा-चाची, दादा-दादी, नाना-नानी तथा सासु-ससुर भी पूजनीय हैं) का उनके लिए आवश्यक सामग्री प्रस्तुत करके सत्कार करना।
आचार्य और अतिथि ( जो विद्वान, धार्मिक, परोपकारी, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और निश्छल) का भी माता – पिता के समान ही सत्कार करना ।
पति के द्वारा पत्नि का सत्कार करना और पत्नि के द्वारा पति का सत्कार करना भी पूजा के अन्तर्गत आता है।
इस सन्दर्भ में महाराज मनु की शिक्षा महत्वपूर्ण है
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम्।।
जिस कुल में भार्या से प्रसन्न पति और पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करता है।
जड़ देवताओं ( प्राण, अग्नि, जल, वायु और सूर्यादि) का पूजन केवल अग्निहोत्र ( देव यज्ञ) से ही होता है। क्योंकि अग्नि देवताओं का मुख है जैसे मुख को देने पर पूरे शरीर का पोषण हो जाता है वैसे ही अग्निहोत्र करने से सभी जड़ देवताओं का पूजन हो जाता है। प्राचीन काल में पूजा के स्थान पर पांच यज्ञों का वर्णन मिलता है-
१. ब्रह्म यज्ञ ( सन्ध्या और स्वाध्याय)
२. देव यज्ञ ( अग्निहोत्र = हवन)
३. पितृ यज्ञ ( माता – पिता की सेवा)
४. अतिथि यज्ञ ( विद्वानों का सत्कार)
५. बलिवैश्वदेव यज्ञ ( जीवों के लिए कुछ भोज्य पदार्थ निकालना)।
महर्षि दयानन्द सरस्वती महाराज ने अपने साहित्य और व्याख्यानों में स्थान स्थान पर इन्ही का वर्णन किया है ।
अब हम वर्तमान में प्रचलित कुछ पूजा का विश्लेषण करेंगे –
पूजा के नाम पर बहुत सारा सामान मंगाया जाता है, एक चौकी सजाई जाती है फिर यजमान को कहा जाता है अब देवता चौकी पर आरहे हैं आप उनको अमुक अमुक सामान भेंट कीजिए और बारी बारी से देवताओं के पूजन के नाम पर सारा सामान चौकी पर चढ़वा दिया जाता है । आप कभी पूजा कराने वाले से पूछियेगा कि महाराज ! किस देवता को आपने चौकी पर बुलाया था तो हो सकता है वह कहेगा कि गणेश, ब्रह्मा, विष्णु या देवी को बुलाया था लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि परमेश्वर के अतिरिक्त ऐसा कोई देवता होता ही नही है । हम पिछली चर्चाओं में यह बता चुके हैं कि परमेश्वर का ही नाम गणेश है – “गण संख्याने” इस धातु से ‘गण’ शब्द सिद्ध होता है, इसके आगे ‘ईश’ वा ‘पति’ शब्द रखने से ‘गणेश’ और ‘गणपति शब्द’ सिद्ध होते हैं। ‘ये प्रकृत्यादयो जडा जीवाश्च गण्यन्ते संख्यायन्ते तेषामीशः स्वामी पतिः पालको वा’ जो प्रकृत्यादि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी वा पालन करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम ‘गणेश’ वा ‘गणपति’ है।
इसीप्रकार ब्रह्मा, विष्णु और देवी भी परमेश्वर के ही नाम हैं और वह परमेश्वर सर्वत्र व्यापक है तो वह चौकी पर भी है अर्थात् बुलाने का नाटक व्यर्थ ही रहा ना ।
जब से भारत में पुराणों का प्रचार हुआ है तब से अन्ध परम्पराएं प्रचारित हो गयी है।
चौकी पुजा, मूर्ति पूजा, नदी पूजा, वृक्ष पूजा, तथा कब्र पूजा निरर्थक है इनसे लाभ कुछ नही बल्कि हानि ही हानि है।
माता श्रीमती शान्ति नागर की कविता यहां बहुत अच्छा सन्देश देती है –
मंदिरों में जले सैकड़ों दीप हैं ।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।।
झोपडी में किसी की जलाओ दिया …
ये कलश के कलश दूध अभिषेक का
फैलता नालियों में बहा जा रहा ।
घूंट दो घूंट देदेते मासूम को
याद जिसको नहीं दूध कब था पिया ।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया ।।
ये थाल व्यंजन भरे जिसके आगे धरे
वो न सूंघेगा खाना बड़ी बात है ।
टूक दो टूक दे दो अभागे को तुम
भूख को मेटने जिसने पानी पिया ।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया !!
तुमने चुंदरी चढ़ाई बड़ी भक्ति से
सैकड़ों चुदारियां हैं न ओढेगी वो ।
उस बेटी के कुर्ते पर डालो नजर
चिंदी चिंदी हुआ अब न जाता सियां।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया ।।
गंगा यमुना की करते रहे आरती
और प्रदूषण भी सारा वहाया वहीं ।
अन्धविश्वास ऐसा प्रबल हो गया
पाप सब धुल गए आचमन कर लिया ।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया ।।
भागवत भी सुनी और कथा राम की
किन्तु बदलाव जीवन में आया नहीं ।
उस व्यथा की कथा भी सुनों तो जरा
जिसकी वेटी ने पति गृह में विष पी लिया ।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया !!!
पर्वतों के शिखर शिव का पूजन किया
और घाटियों में रहे देवियाँ ढूँडते ।
घर के शिव और देवी उपेक्षित पड़े
हैं दुखारी बड़े अब न जाता जिया ।।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया !!
मंदिरों में जले सैकड़ों दीप हैं ।
जिन्दगी में किसीकी जलाओ दिया ।।
झोपडी में किसीकी जलाओ दिया …
“सत्यासत्य के निर्णय के लिए परीक्षा”
आज के समय में सत्यासत्य का निर्णय करना कठिन कार्य है क्योंकि सभी कि अपनी अपनी मान्यतायें हैं तथा अधिकतर लोग अन्धपरम्पाराओं को ढोरहे हैं। इसीलिए आज की चर्चा में सत्यासत्य के निर्णय के लिए अत्यावश्यक और प्रमाणिक तरीके बताने का प्रयास किया गया है।
ध्यान दें –
० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि सत्यासत्य के निर्णय के लिए परीक्षा पांच प्रकार से होती है—
एक— जो-जो ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और वेदों से अनुकूल हो वह-वह सत्य और उससे विरुद्ध असत्य है।
दूसरी— जो-जो सृष्टिक्रम से अनुकूल वह-वह सत्य और जो-जो सृष्टिक्रम से विरुद्ध है वह सब असत्य है। जैसे—कोई कहै ‘विना माता पिता के योग से लड़का उत्पन्न हुआ’ ऐसा कथन सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से सर्वथा असत्य है।
तीसरी— ‘आप्त’ अर्थात् जो धार्मिक विद्वान्, सत्यवादी, निष्कपटियों का संग उपदेश के अनुकूल है वह-वह ग्राह्य और जो-जो विरुद्ध वह-वह अग्राह्य है।
चौथी— अपने आत्मा की पवित्रता विद्या के अनुकूल अर्थात् जैसा अपने को सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है वैसे ही सर्वत्र समझ लेना कि मैं भी किसी को दुःख वा सुख दूँगा तो वह भी अप्रसन्न और प्रसन्न होगा।
और पांचवीं— आठों प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव।
= आगे प्रत्यक्षादि प्रमाणों को समझेंगे —-
प्रत्यक्ष – “इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि-व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्।”(न्याय॰ अध्याय 1 आह्निक 1 सूत्र 4) जो श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण का शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के साथ अव्यवहित अर्थात् आवरणरहित सम्बन्ध होता है, इन्द्रियों के साथ मन का और मन के साथ आत्मा के संयोग से ज्ञान उत्पन्न होता है उस को प्रत्यक्ष कहते हैं परन्तु जो व्यपदेश्य अर्थात् संज्ञासंज्ञी के सम्बन्ध से उत्पन्न होता है वह-वह ज्ञान न हो। जैसा किसी ने किसी से कहा कि ‘तू जल ले आ’ वह लाके उस के पास धर के बोला कि ‘यह जल है’ परन्तु वहां ‘जल’ इन दो अक्षरों की संज्ञा लाने वा मंगवाने वाला नहीं देख सकता है। किन्तु जिस पदार्थ का नाम जल है वही प्रत्यक्ष होता है और जो शब्द से ज्ञान उत्पन्न होता है वह शब्द-प्रमाण का विषय है। ‘अव्यभिचारि’ जैसे किसी ने रात्रि में खम्भे को देख के पुरुष का निश्चय कर लिया, जब दिन में उसको देखा तो रात्रि का पुरुषज्ञान नष्ट होकर स्तम्भज्ञान रहा, ऐसे विनाशी ज्ञान का नाम व्यभिचारी है। ‘व्यवसायात्मक’ किसी ने दूर से नदी की बालू को देख के कहा कि ‘वहां वस्त्र सूख रहे हैं, जल है वा और कुछ है’ ‘वह देवदत्त खड़ा है वा यज्ञदत्त’ जब तक एक निश्चय न हो तब तक वह प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है किन्तु जो अव्यपदेश्य, अव्यभिचारि और निश्चयात्मक ज्ञान है उसी को प्रत्यक्ष कहते हैं।
अनुमान – “अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत् सामान्यतोदृष्टञ्च॥” ( न्याय॰ अ॰ 1 आ॰ 1 सू॰ 5 ) जो प्रत्यक्षपूर्वक अर्थात् जिसका कोई एक देश वा सम्पूर्ण द्रव्य किसी स्थान वा काल में प्रत्यक्ष हुआ हो उसका दूर देश में सहचारी एक देश के प्रत्यक्ष होने से अदृष्ट अवयवी का ज्ञान होने को अनुमान कहते हैं। जैसे पुत्र को देख के पिता, पर्वतादि में धूम को देख के अग्नि, जगत् में सुख दुःख देख के पूर्वजन्म का ज्ञान होता है। वह अनुमान तीन प्रकार का है। एक ‘पूर्ववत्’ जैसे बद्दलों को देख के वर्षा, विवाह को देख के सन्तानोत्पत्ति, पढ़ते हुए विद्यार्थियों को देख के विद्या होने का निश्चय होता है, इत्यादि जहां-जहां कारण को देख के कार्य का ज्ञान हो वह ‘पूर्ववत्’। दूसरा ‘शेषवत्’ अर्थात् जहां कार्य को देख के कारण का ज्ञान हो। जैसे नदी के प्रवाह की बढ़ती देख के ऊपर हुई वर्षा का, पुत्र को देख के पिता का, सृष्टि को देख के अनादि कारण का तथा कर्त्ता ईश्वर का और पाप पुण्य के आचरण को देख के सुख दुःख का ज्ञान होता है, इसी को ‘शेषवत्’ कहते हैं। तीसरा ‘सामान्यतोदृष्ट’ जो कोई किसी का कार्य कारण न हो परन्तु किसी प्रकार का साधर्म्य एक दूसरे के साथ हो जैसे कोई भी विना चले दूसरे स्थान को नहीं जा सकता वैसे ही दूसरों का भी स्थानान्तर में जाना विना गमन के कभी नहीं हो सकता। अनुमान शब्द का अर्थ यही है कि अनु अर्थात् ‘प्रत्यक्षस्य पश्चान्मीयते ज्ञायते येन तदनुमानम्’ जो प्रत्यक्ष के पश्चात् उत्पन्न हो जैसे धूम के प्रत्यक्ष देखे विना अदृष्ट अग्नि का ज्ञान कभी नहीं हो सकता।
उपमान – प्”रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्॥”(न्याय॰ अ॰ 1 आ॰ 1 सू॰ 6) जो प्रसिद्ध प्रत्यक्ष साधर्म्य से साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य ज्ञान की सिद्धि करने का साधन हो उसको उपमान कहते हैं। ‘उपमीयते येन तदुपमानम्’ जैसे किसी ने किसी भृत्य से कहा कि ‘तू देवदत्त के सदृश विष्णुमित्र को बुला ला’ वह बोला कि ‘मैंने उसको कभी नहीं देखा’ उस के स्वामी ने कहा कि ‘जैसा यह देवदत्त है वैसा ही वह विष्णुमित्र है’ वा ‘जैसी यह गाय है वैसा ही गवय अर्थात् नीलगाय होता है।’ जब वह वहां गया और देवदत्त के सदृश उस को देख निश्चय कर लिया कि यही विष्णुमित्र है, उसको ले आया। अथवा किसी जङ्गल में जिस पशु को गाय के तुल्य देखा उसको निश्चय कर लिया कि इसी का नाम गवय है।
शब्दप्रमाण – “आप्तोपदेशः शब्दः॥” (न्याय॰ अ॰ 1 आ॰ 1 सू॰ 7 ) जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकारप्रिय, सत्यवादी, पुरुषार्थी, जितेन्द्रिय पुरुष जैसा अपने आत्मा में जानता हो और जिस से सुख पाया हो उसी के कथन की इच्छा से प्रेरित सब मनुष्यों के कल्याणार्थ उपदेष्टा हो अर्थात् जितने पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों का ज्ञान प्राप्त होकर उपदेष्टा होता है। जो ऐसे पुरुष और पूर्ण आप्त परमेश्वर के उपदेश वेद हैं, उन्हीं को शब्दप्रमाण जानो।
ऐतिह्य – “न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्तिसम्भवाभावप्रामाण्यात्॥” ( न्याय॰ अ॰ 2 आ॰ 2 सू॰ 1) जो इति ह अर्थात् इस प्रकार का था उस ने इस प्रकार किया अर्थात् किसी के जीवन-चरित्र का नाम ऐतिह्य है।
अर्थापत्ति – ‘अर्थादापद्यते सा अर्थापत्तिः’ केनचिदुच्यते ‘सत्सु घनेषु वृष्टिः, सति कारणे कार्यं भवतीति किमत्र प्रसज्यते, असत्सु घनेषु वृष्टिरसति कारणे च कार्यं न भवति।’ जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘बद्दल के होने से वर्षा और कारण के होने से कार्य उत्पन्न होता है’ इस से विना कहे यह दूसरी बात सिद्ध होती है कि विना बद्दल वर्षा और विना कारण कार्य कभी नहीं हो सकता।
सातवां सम्भव – ‘सम्भवति यस्मिन् स सम्भवः’ कोई कहे कि ‘माता पिता के विना सन्तानोत्पत्ति, किसी ने मृतक जिलाये, पहाड़ उठाये, समुद्र में पत्थर तराये, चन्द्रमा के टुकड़े किये, परमेश्वर का अवतार हुआ, मनुष्य के सींग देखे और वन्ध्या के पुत्र और पुत्री का विवाह किया, इत्यादि सब असम्भव हैं। क्योंकि ये सब बातें सृष्टिक्रम से विरुद्ध हैं। जो बात सृष्टिक्रम के अनुकूल हो वही सम्भव है।
अभाव -‘न भवन्ति यस्मिन् सोऽभावः’ जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘हाथी ले आ’ वह वहां हाथी का अभाव देख कर जहां हाथी था वहां से ले आया।
ये आठ प्रमाण। इन में से जो शब्द में ऐतिह्य और अनुमान में अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव की गणना करें तो चार प्रमाण रह जाते हैं।
इन चार प्रकार की परीक्षाओं से मनुष्य सत्यासत्य का निश्चय कर सकता है अन्यथा नहीं।
० महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने तर्कसंगत यह भी बताया कि पठनीय कौन कौन ग्रन्थ है और कौन ग्रन्थ अपठनीय है।
= आइये प्रथम पठनीय की चर्चा करते हैं –
वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ।
उपवेद – आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्दर्भवेद और अर्थवेद।
वेदांग – शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष।
उपांग – न्याय, योग, मीमांसा, सांख्य, वैशेषिक और वेदान्त।
ब्राह्मण ग्रन्थ – ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ ।
उपनिषद – ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छन्दोग्य और बृहदारण्यक ।
मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि।
ऋषिप्रणीत ग्रन्थों को इसीलिये पढ़ना चाहिए कि वे बड़े विद्वान् सब शास्त्रवित् और धर्मात्मा थे। और अनृषि अर्थात् जो अल्प शास्त्र पढे़ हैं और जिनका आत्मा पक्षपात सहित है, उनके बनाये ग्रन्थ भी वैसे ही हैं।
ध्यान दें —-
वेदों के उपवेद, अंग और उपांग आदि सब ऋषि मुनि के किये ग्रन्थ हैं। इनमें भी जो जो वेदविरुद्ध प्रतीत हो उस उस को छोड़ देना क्योंकि वेद ईश्वर कृत होने से निर्भ्रान्त स्वतः प्रमाण अर्थात् वेद का प्रमाण वेद ही से होता है। ब्राह्मणादि सब ग्रन्थ परतः प्रमाण अर्थात् इनका प्रमाण वेदाधीन है।
= अब जो परित्याग के योग्य ग्रन्थ हैं उनका परिगणन संक्षेप में किया जाता है अर्थात् जो जो नीचे ग्रन्थ लिखेंगे वह-वह जाल ग्रन्थ समझना चाहिए ।
व्याकरण में कातन्त्र, सारस्वत, चन्द्रिका,मुग्धबोध, कौमुदी, शेखर, मनोरमादि।
कोश में अमरकोशादि।
छन्दोग्रन्थ में वृत्तरत्नाकरादि।
शिक्षा में ‘अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा’ इत्यादि।
ज्योतिष में शीघ्रबोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि, आदि।
काव्य में नायिकाभेद, कुवलयानन्द, रघुवंश, माघ, किरातार्जुनियादि।
मीमांसा में धर्म सिन्धु, व्रतार्कादि।
वैशेषिक में तर्कसंग्रहादि।
न्याय में जागदीशी आदि।
योग में हठप्रदीपिकादि।
सांख्य में सांख्यतत्वकौमुद्यादि।
वेदान्त में योगवासिष्ठ पञ्चदश्यादि।
वैद्यक में शार्ङ्गधरादि।
स्मृतियों में मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोक और अन्य सब स्मृति, सब तन्त्र ग्रन्थ, सब पुराण, सब उपपुराण, तुलसीदास कृत भाषा रामायण, रुक्मिणीमङ्गलादि और सर्व भाषा ग्रन्थ ये सब कपोलकल्पित मिथ्या ग्रन्थ हैं।
उपरोक्त विचारों पर कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं जिनका उत्तर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं –
(प्रश्न) क्या इन ग्रन्थों में कुछ भी सत्य नहीं?
(उत्तर) थोड़ा सत्य तो है परन्तु इसके साथ बहुत सा असत्य भी है। इस से ‘विषसम्पृक्तान्नवत् त्याज्याः’ जैसे अत्युत्तम अन्न विष से युक्त होने से छोड़ने योग्य होता है वैसे ये ग्रन्थ हैं।
(प्रश्न) क्या आप पुराण इतिहास को नहीं मानते?
(उत्तर) हां मानते हैं परन्तु सत्य को मानते हैं मिथ्या को नहीं।
(प्रश्न) कौन सत्य और कौन मिथ्या है?
(उत्तर) ब्राह्मणानीतिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथा नाराशंसीरिति॥
—यह गृह्यसूत्रादि का वचन है।
जो ऐतरेय, शतपथादि ब्राह्मण लिख आये उन्हीं के इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी पांच नाम हैं; श्रीमद्भागवतादि का नाम पुराण नहीं।
(प्रश्न) जो त्याज्य ग्रन्थों में सत्य है उसका ग्रहण क्यों नहीं करते?
(उत्तर) जो-जो उनमें सत्य है सो-सो वेदादि सत्य शास्त्रों का है और मिथ्या उनके घर का है। वेदादि सत्य शस्त्रों के स्वीकार में सब सत्य का ग्रहण हो जाता है। जो कोई इन मिथ्या ग्रन्थों से सत्य का ग्रहण करना चाहै तो मिथ्या भी उस के गले लिपट जावे। इसलिए ‘असत्यमिश्रं सत्यं दूरतस्त्याज्यमिति’ असत्य से युक्त ग्रन्थस्थ सत्य को भी वैसे छोड़ देना चाहिए जैसे विषयुक्त अन्न को।
आजकल के सम्प्रदायी और स्वार्थी ब्राह्मण आदि जो दूसरों को विद्या सत्संग से हटा और अपने जाल में फंसा के उन का तन, मन, धन नष्ट कर देते हैं और चाहते हैं कि जो क्षत्रियादि वर्ण पढ़ कर विद्वान् हो जायेंगे तो हमारे पाखण्डजाल से छूट और हमारे छल को जानकर हमारा अपमान करेंगे इत्यादि विघ्नों को राजा और प्रजा दूर करके अपने लड़कों और लड़कियों को विद्वान् करने के लिये तन, मन, धन से प्रयत्न किया करें।
“ईश्वर सिद्धि”
सर्व प्रथम प्रश्न यह है कि ईश्वर नाम की कोई सत्ता है भी या नहीं। यद्यपि संसार के अधिकतम लोग ईश्वर में विश्वास रखते हैं। ( यद्यपि इन में ईश्वर के स्वरूप व कर्तव्य को लेकर अतीव मत भिन्नता है) पर ऐसा प्रतीत होता है कि वे केवल परम्परावश ऐसा मानते हैं । यही कारण है कि विभिन्न उपासना पद्धति का अवलम्बन करने वाली नई पीढ़ी से ईश्वर सम्बन्धी प्रश्न किए जाते हैं तो शीघ्र ही यह सामने आ जाता है कि ईश्वर की सत्ता में इनका दृढ़ विश्वास नहीं है और जब दृढ़ विश्वास ही नहीं है तो ईश्वर उपासना एवं ईश्वर प्राणिधान के कोई मायने नहीं रह जाते अत एव ईश्वर की सत्ता में अटूट विश्वास होना अत्यन्त आवश्यक है यह अटूट विश्वास ही परहित हेतु स्वयं का सर्वस्व निछावर कर देने की उदात्त भावना का आधार है।
ईश्वर का प्रत्यक्ष कैसे हो ?
कुछ लोग ईश्वर का अस्तित्व इसीलिए नहीं मानते क्योंकि वह आंखों से दिखाई नहीं देता है। अर्थात् जो पदार्थ आंखों से दिखाई देता है उसी का अस्तित्व माना जा सकता है। पर क्या यह अभिकथन सही है? तनिक भी गम्भीरता पूर्वक विचार करते हैं तो इस दावे की पोल खुल जाती है संसार में अनेकानेक ऐसे पदार्थ हैं जो दिखाई नहीं देते परन्तु उनका अस्तित्व निर्विवाद है।
विचार करें निम्न परिस्थितियों में हमें वस्तुएं दिखाई नहीं देती हैं परन्तु क्या हम उनके अस्तित्व से इन्कार कर सकते हैं ? कदापि नहीं।
इसी प्रकार का प्रसङ्ग साङ्ख्य दर्शन में आया है –
“विषयोऽविषयोऽप्यतिदूरादेर्हानोपादानाभ्यामिन्द्रियस्य” (१/६३)
(विषयःअपि) विषय भी (इन्द्रियस्य) इन्द्रिय का ( अविषयः) अविषय है (अतिदूरादेः) अतिदूर आदि (कारण) से (हानोपादानाभ्यां)हान और उपादान से(इन्द्रिय के)।
किसी वस्तु के अभाव को केवल इतने से निर्धारित नहीं किया जा सकता कि वह इन्द्रियों से नहीं जानी जा रही। यदि यह विचार ठीक होता की जो वस्तु इन्द्रिय द्वारा नहीं जानी जाती, उसका अभाव स्वीकार करना चाहिए तो अतीन्द्रिय प्रकृति आदि पदार्थों का अनुपलब्धि के कारण अभाव स्वीकार किया जा सकता था। परन्तु अनेक बार ऐसा होता है विद्यमान पदार्थ भी कुछ दोषों के कारण इन्द्रिय का अविषय रहता है, अर्थात् इन्द्रिय गोचर नहीं हो पाता।
वे दोष इस प्रकार हैं =अतिदूर- कोई भी पदार्थ अति दूर होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे आकाश में दूर उड़ता हुआ पक्षी चक्षु से नहीं दीख पाता यदि वही पदार्थ ठीक दूरी पर हो तो दिख जाता है। सूत्र का आदि पद ‘अतिदूर’ के विरोधी ‘अतिसमीप’ का परामर्शक है। इसप्रकार दूसरा दोष है =अतिसमीप- अतिसमीप होने पर भी कोई वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होती। जैसे आंख में लगाया हुआ अंजन उस आंख से नहीं दिखता। वही ठीक दूरी से अन्य आंख के द्वारा देखा जाता है। तीसरा दोष है=हान- इन्द्रिय शक्ति की हानि होना, अर्थात् इन्द्रिय की दुर्बलता, जैसे अन्धे और बधिर – रूप और शब्द का ग्रहण नहीं कर पाते। उन्हीं रूप और शब्द को वे ग्रहण कर लेते हैं जिनके चक्षु और श्रोत्र इन्द्रिय ठीक होते हैं। यह दोष इन्द्रियगत है अन्य दोष विषतगत हैं। चौथा दोष =उपादान- इन्द्रिय और विषय के मध्य में किसी अन्य वस्तु का उपस्थित हो जाना अर्थात् किसी भी मूर्तिमान वस्तु का व्यवधान। जैसे दीवार आदि के परे की विद्यमान वस्तु भी दृष्टिगोचर नहीं होती। वही वस्तु मध्य में दीवार न होने पर दिख जाती है। यह सब दोष ऐसे विषयों में लागू होते हैं जो किसी समय इन्द्रिय गोचर होते हों। इसीलिए यह नहीं कहा जा सकता कि जो पदार्थ एक समय नहीं दिख रहा उसका तो अस्तित्व नहीं है।
सर्वथा अतीन्द्रिय प्रकृति आदि पदार्थों की अनुपलब्धि में इन दोषों को बाधक नहीं कहा जा सकता क्योंकि प्रकृति आदि पदार्थ कभी दृष्टिगोचर नहीं होते तब उनकी अनुपलब्धि उनके अभाव की ही साधक समझी जानी चाहिए।
सूत्रकार कहता है –
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः।।(सांख्य१/७४)
सौक्ष्म्यात् तदनुपलब्धिः = (तदनुपलब्धिः) प्रकृति आदि की अनुपलब्धि (सौक्ष्म्यात्) सूक्ष्मता से है।
प्रकृति की अनुपलब्धि सौक्ष्म्य के कारण होती है जगत के मूल कारण सत्व-रजस्-तमस् अतिशय अणुरूप होने के कारण अति सूक्ष्म होते हैं उनका ग्रहण करना इन्द्रियों की शक्ति से परे है। जब इन्द्रियां उन्हें ग्रहण ही नहीं कर सकती तब इन्द्रियों के द्वारा उनकी अनुपलब्धि उनके अभाव का साधक नहीं कही जा सकती।
सूक्ष्म होने के कारण यदि इन्द्रियों से प्रकृति की अनुपलब्धि उसके अभाव की साधक नहीं, तो प्रकृति का ज्ञान किसी उपाय से होना चाहिए।
सूत्रकार कहता है –
कार्यदर्शनात्तदुपलब्धेः।।(सांख्य१/७५)
(कार्यदर्शनात्) कार्य ज्ञान से अथवा कार्य देखे जाने से ( तदुपलब्धेः) प्रकृति का ज्ञान हो जाने के कारण उसका अभाव नहीं ।
प्रकृति की उपलब्धि, कार्य देखने से हो जाती है। यद्यपि प्रकृति अतीन्द्रिय पदार्थ है पर यह समस्त जड़ जगत उसका कार्य है। हम देखते हैं यहां प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक व्यवहार, प्रत्येक विचार सुख-दुख-मोहात्मक है, इस प्रकार जगत त्रिगुणात्मक सिद्ध होता है। इसमें लगातार होने वाले परिणाम को देखकर हम यह जान लेते हैं कि इसका कोई त्रिगुणात्मक मूल उपादान अवश्य होना चाहिए क्योंकि कोई परिणामी तत्व अपने मूल उपादान के बिना नहीं हो सकता, यह नियम है। इसी प्रकार त्रिगुणात्मक कार्य जगत से उसके मूल उपादान त्रिगुणात्मक प्रकृति का अनुमान हो जाता है। फलतः केवल दृष्टिगोचर न होने से प्रकृति का अभाव नहीं माना जा सकता।
अनेक आशंकावादी मूल उपादान के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की कल्पना कर सकते हैं। उस अवस्था में त्रिगुणात्मक प्रकृति के अस्तित्व का सिद्धान्त स्थिर नहीं रहता। इसी आशंका को सूत्रकार कहता है –
वादिविप्रतिपत्तेस्तदसिद्धिरिति चेत्।।(सांख्य१/७६)
(वादिविप्रतिपत्तेः) वादियों के विरुद्ध कथन से ( तदसिद्धिः इति चेत्) (मूल उपादान ) प्रकृति की असिद्धि कहो यदि।
मूल उपादान के सम्बन्ध में वादी अनेक प्रकार के कथन उपस्थित कर सकते हैं। जैसे कोई चेतन ईश्वर से जगत की उत्पत्ति कहने लगे अथवा जगत का उपादान पुरुष को बताए । इसी प्रकार कोई स्वभाव को उपादान कहे। अन्य कोई अकारण ही जगत को उत्पन्न हुआ मान ले। कोई सूक्ष्म भूतों को समस्त जगत का उपादान बतलाए। इन सब मान्यताओं के रहने पर केवल प्रकृति को उपादान कैसे माना जा सकेगा ? इसी प्रकार वादियों के द्वारा मूल उपादान के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के कल्पित बाद उपस्थित कर देने से प्रकृति की निर्भ्रान्त सिद्धि नहीं हो सकती। ऐसी आशंका होने पर सूत्रकार कहता है-
तथाप्येकतरदृष्टया एकतरसिद्धेर्नापलादः (सांख्य१/७७)
(तथापि) तो भी ( एकतरदृष्टया) कार्य ज्ञान द्वारा (एकतर सिद्धेः) कारण की सिद्धि से ( अपलापः न) ‘प्रकृति का’ अपलाप नही।
इन सब कथित कल्पनाओं के होने पर भी समस्त वादियों ने कार्य कारण भाव को स्वीकार किया ही है। तब यह सिद्धान्त तो स्थिर माना जाएगा – कि एकतर कार्य के देखने से एकतर कारण की सिद्धि होती है। इस प्रकार कार्य के देखे जाने से कारण के अस्तित्व का अपलाप नहीं किया जा सकता। प्रत्येक वादी ने इस बात को निर्भ्रान्त रूप से स्वीकार किया है। कि कार्य मात्र का कोई मूल कारण अवश्य होता है।
वह मूल कारण प्रकृति ही क्यों हो सकता है अन्य नहीं?
सूत्र कार कहता है –
त्रिविधविरोधापत्तेश्च।।(सांख्य १/७८)
(त्रिविधविरोधापत्तेः) त्रिविधता के विरोध की आपत्ति से (च) तथा परिणामिता अचेतनता आदि के (विरोध की आपत्ति से)।
यदि त्रिगुणात्मक प्रकृति के अतिरिक्त, अन्य ईश्वर आदि को जगत का मूल उपादान माना जाए, तो संसार में अनुभूयमान त्रिविधता के विरोध की प्राप्ति होगी। जगत के प्रत्येक पदार्थ, व्यवहार तथा भावना में त्रिगुणात्मकता देखी जाती है इससे त्रिगुणात्मक मूल कारण का अनुमान किया जा सकता है। ईश्वर आदि को मूल उपादान मानने पर जगत की दृष्टत्रिगुणात्मकता का विरोध होगा क्योंकि ईश्वर आदि तत्व त्रिगुणात्मक नहीं हैं यदि उनको भी त्रिगुणात्मक मान लिया जाए तो शब्द मात्र का भेद होगा, मूल कारण तो त्रिगुणात्मक ही रहा। सूत्र का ‘च’ पद प्रकृति के परिणामी और चेतन आदि स्वरूप का संग्रह करता है। ईश्वर आदि को जगत का मूल उपादान मानने पर यथासंभव इसके परिणाम अचेतनत्व आदि का भी विरोध प्राप्त होगा।उस अवस्था में संसार परिणामी व अचेतन भी न हो सकेगा, जो प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के विरुद्ध है। इन सब कारणों से त्रिगुणात्मक प्रकृति को ही जगत का मूल उपादान स्वीकार किया जा सकता है।
इसी प्रसंग को “सांख्य कारिका” में ईश्वर कृष्ण ने इस प्रकार लिखा है –
अतिदूरात् समीप्यादिन्द्रियघातान्मेनोऽनवस्थानात्।
सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च।। (सांख्यकारिका)
अतिदूरात् = अत्यन्त दूर होने पर – आकाश में उड़ता पक्षी।
समीप्यात् = अत्यन्त समीप होने से – आंख का काजल।
इन्द्रियघातात् = इन्द्रिय शक्ति की हानि – मोतियाबिन्द, रतौधी।
मनोऽनवस्थानात् = मन के विचलित होने पर – ध्यान कहीं अन्यत्र।
सौक्ष्म्यात् = अत्यन्त सूक्ष्म होने पर – अणु आदि।
व्यवधानात् = इन्द्रिय और विषय के बीच व्यवधान होने पर – दीवार के परे।
अभिभवात् = एक वस्तु के अभिभूत होने पर
समानाभिहारात् = किसी वस्तु के सजातीय सम्मिश्रण के कारण प्रत्यक्ष नही हो पाता।
प्रकृति और प्रमेय अत्यन्त सूक्ष्म और समीप होने से ही प्रत्यक्ष नही हो पाता है। यद्यपि कार्य के आधार पर उनकी उपलब्धि अनुमेय है।
० देखने में सहायक पदार्थ ना होने के कारण – सूर्य के प्रकाश या अन्य कृत्रिम प्रकाश के अभाव में ।
० आंख का विषय न होने के कारण – वायु, सुगन्ध तथा संगीत आदि नहीं देखे जा सकते।
० अभौतिक पदार्थ – सर्दी, गर्मी, भूख – प्यास, दर्द आदि।
० मध्य में आए आवरण के कारण – भूमिगत रत्नादि, कमरे में दीवार के पीछे की वस्तुएं दिखाई नहीं देती है।
० कुछ गुण समान होने के कारण – दूध में पानी, गाय के दूध में भैंस का दूध।
स्पष्ट है हर वस्तु आंखों से नहीं दीख सकती, केवल रूप गुण जिसमें है आंखों का विषय होने के कारण वही वस्तुएं दिखाई देती है परंतु ना दिखाई देने वाली वस्तुओं का भी अस्तित्व है यह निश्चित है।
वस्तुतः जैसा वस्तु का सम्बन्ध जिस ज्ञानेन्द्रिय से है हम उसी ज्ञानेन्द्रिय से वस्तु को जानते हैं जैसे इत्र का ज्ञान नासिका से, मीठे, खट्टे, नमकीन का ज्ञान रसना से, वायु की उपस्थिति, शीतादि का ज्ञान त्वचा से, व शब्द का ध्यान कर्णेन्द्रिय से करते हैं।
यहां यह भी स्पष्ट कर जान लेना चाहिए इन्द्रिय गोचर पदार्थ का ज्ञान ही इन्द्रियों द्वारा हो सकता है। अतीन्द्रिय पदार्थ का ज्ञान इन्द्रियों द्वारा नहीं हो सकता परन्तु ऐसा ना हो सकने मात्र से इनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए इन्द्रियों को ही ले लीजिए इन्हें इन्द्रियों द्वारा तो जाना नहीं जा सकता क्योंकि कोई भी दृष्टा स्वयं दृश्य नहीं हो सकता और एक इन्द्रिय से दूसरी इन्द्रियों भी नहीं जानी जा सकती क्योंकि उनके विषय भिन्न भिन्न हैं।
आंख का विषय रूप, नासिका का गन्ध, जिह्वा का रस, त्वचा का स्पर्श और कानों का विषय शब्द है। अतः नाक – आंख को नहीं जान सकती, जिह्वा कानों को नहीं जान सकती। इन इन्द्रियों को भी इनसे काम लेने वाली चेतन शक्ति अनुभव से जानती है। अर्थात् जब वह रस का ज्ञान जिह्वा से प्राप्त करती है तो उसे रसनेन्द्रिय की जानकारी होती है। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के विषय में है। यही अनुभव इन्द्रियों का प्रत्यक्ष है।
ठीक इसी प्रकार जीवात्मा बिना भौतिक इन्द्रीयों/ भौतिक करणों की सहायता से अष्टांग योग के मार्ग पर चलते हुए परमात्मा का साक्षात्कार करता है। महर्षि दयानन्द जी सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में स्पष्ट लिखते हैं – “और जब जीवात्मा शुद्धान्तःकरण से युक्त योगी समाधिस्थ होकर आत्मा और परमात्मा का विचार करने में तत्पर रहता है तब उसको उसी समय दोनों प्रत्यक्ष होते हैं। जब परमेश्वर का प्रत्यक्ष होता है तो अनुमान आदि से परमेश्वर के जान होने में क्या संदेह है क्योंकि कार्य को देखकर के कारण का अनुमान होता है।”
इन्द्रिय प्रत्यक्ष को ही सर्वोपरि अधिमान देने का आग्रह करने वाले मनीषियों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन्द्रियों से गुणों का प्रत्यक्ष होता है न कि गुणी का। ऋषि लिखते हैं – अब विचारना चाहिए कि इन्द्रियों और मन से गुणों का प्रत्यक्ष होता है, गुणी का नहीं।( सत्यार्थ प्रकाश सप्तम समुल्लास) इसका तात्पर्य है कि इन्द्रियों द्वारा अपने अपने विषय की सूचना ही मन को प्रेषित की जाती है। उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति खस के शरबत का सेवन करता है तो रंग व तरलता की सूचना आंख द्वारा, गन्ध की सूचना नाक द्वारा, ठंडे होने की सूचना त्वचा द्वारा व मीठे होने की सूचना जिह्वा द्वारा मन को प्राप्त होने पर बुद्धि द्वारा समवेत रूप से विश्लेषण करने पर पूर्व स्मृति के आधार पर खस के शरबत का प्रत्यक्ष कर लिया ऐसा कहा जाता है। वस्तुतः प्रत्यक्ष तो भिन्न – भिन्न गुणों का ही हुआ है गुणी का नहीं । यदि यहां शरबत पीने वाले ने पूर्व में कभी इस पेय पदार्थ को नहीं पिया हो, इस पीने की कोई स्मृति उसके पास ना हो तो वह इतना मात्र ही कहेगा कि यह तरल पेय पदार्थ जो अमुक रंग का है, मीठा, शीतल व स्वादिष्ट है। और मेजबान से पूछेगा कि यह क्या है? अर्थात् गुणों का प्रत्यक्ष होने पर भी गुणी का प्रत्यक्ष न हुआ। होता यह है कि गुण – गुणी का समवाय सम्बन्ध होने से गुणों के साथ गुणी का प्रत्यक्ष मान लिया जाता है।मन की आशु गति के कारण यह प्रक्रिया इतने वेग से होती है कि हम गुणी का ही प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।
सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में ऋषि दयानन्द स्पष्ट लिखते हैं – जैसे चारों त्वचा आदि इन्द्रियों से स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का ज्ञान होने से गुणी जो पृथ्वी उसका आत्मायुक्त मन से प्रत्यक्ष किया जाता है वैसे इस प्रत्यक्ष होने से परमेश्वर का भी प्रत्यक्ष है। हमारे विचार से ऋषि स्पष्ट ईश्वर प्रत्यक्ष मानते हैं।
न्याय दर्शनकार ने आठ प्रमाणों को मान्यता दी है जिनमें एक अनुमान प्रमाण है लोक में व्यवहृत अनुमान शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि अनुमान अत्यन्त साधारण कोटि का तर्क विहीन प्रमाण है परन्तु ऐसा नहीं है। अनुमान प्रमाण को भी किसी भी प्रकार कम करके नहीं आंका जा सकता। क्योंकि अनुमान वहीं होता है – जहां पूर्व में प्रत्यक्ष कार्य – कारण श्रंखला का ही एक घटक होने से दूसरे का निश्चय, अनुमान प्रमाण द्वारा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर हम लोक में देखते आते हैं कि माता पिता के संयोग से पुत्र – पुत्री उत्पन्न होते हैं। अतः किसी पुत्र अथवा पुत्री को देखकर अनुमान प्रमाण के अन्तर्गत यह निश्चय से कहा जा सकता है की इनके माता-पिता भी निश्चित होंगे – फिर चाहे हमने उनके माता – पिता के दर्शन न भी किये हों। इसी प्रकार अग्नि व धूंए का साहचर्य जग प्रसिद्ध है अतः कालान्तर में धूंए को देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है।
इसी प्रकार लोक में आप किसी भी कृति को देखिये। हमें पता है कि उसका करता अवश्य होता है। मिट्टी का घड़ा कुम्हार द्वारा, आभूषण सुनार द्वारा, वस्त्र बुनकर व मूर्ति शिल्पकार द्वारा बनाई जाती है यह हमें प्रत्यक्ष है। कभी हम किसी कारणवश सुनसान उजाड़ जंगल में पहुंच जावें और वहां एक आभूषण हमें पड़ा दिखे तो चाहे उस बियाबान जंगल में मनुष्य के पहुंचने की संभावना कितनी भी क्षीण हो हम यह अनुमान लगाने में एक क्षण की देर नहीं लगाते कि यह आभूषण किसी सुनार ने बनाया है उससे किसी मनुष्य ने खरीदा होगा और वह किसी कारणवश इस जंगल में आया होगा और आभूषण यहां गिर गया होगा। अनुमानों की इस श्रंखला में क्या हम एक भी क्षण को यह सोचते हैं यह आभूषण जमीन के अंदर अपने आप बनकर जमीन फोड़कर निकल आया है? कदापि नहीं। ऐसा क्यों? क्योंकि संसार में कार्य-कारण की श्रृंखला प्रत्यक्ष है। यह प्रत्यक्ष है कि कारण के बिना कार्य नहीं हो सकता। रचना है तो रचनाकार का होना आवश्यक है। इस सन्दर्भ में लगाया गया अनुमान किसी प्रत्यक्ष से कम नहीं होता। पर यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लोक में अनगढ़ से अनगढ़ रचना को भी हम अकस्मात् हुई नहीं मानते कागज पर दो तीन रंगों की आड़ी तिरछी लाइनों को देखकर हम कभी भी यह स्वीकार नहीं करते कि अपने आप दो तीन तरह के रंग आकर मिल गए होंगे परन्तु जब आश्चर्यजनक कारीगरी, अटूट नियमों से युक्त महानतम रचना इस सृष्टि को देखते हैं तो हममें से अनेक इसके रचयिता के अस्तित्व को मानने में संकोच कर नाना प्रकार के कुतर्कों का आश्रय लेते हैं। ऐसी मानसिकता को उचित कदापि नहीं कहा जा सकता।
कृपया निम्न दृष्टान्तों पर विचार कीजिए –
० भूगर्भ शास्त्रियों को जमीन की परतों के मध्य एक सिला हुआ जूता मिला जिसकी आयु उन्होंने साठ हजार वर्ष के लगभग निश्चित की। इन वैज्ञानिकों ने बिना एक क्षण भी यह बेचारे की यह जूता अपने आप बन गया होगा इसे स्वभावतः ही मानव निर्मित मान साठ हजार वर्ष पुरानी सभ्यता की व्याख्या का प्रयास किया। जब साठ हजार वर्ष पुराने जूते के निर्माता के बारे में जिसे किसी ने देखा नहीं, कोई सन्देह न कर निश्चयात्मक अनुमान किया जा सकता है तो सृष्टि कर्ता परमात्मा के बारे में यह कहकर कि उसे किसी ने देखा नहीं क्योंकर सन्देह करना चाहिए।
० भूगोल के एक प्रोफ़ेसर के एक ऐसे मित्र जो सृष्टि कर्ता ईश्वर के अस्तित्व में सन्देह करते व सृष्टि को स्वतः (अपने आप) अकस्मात् निर्मित मानते थे, प्रोफेसर की मेज पर रखे सौर मण्डल के सुन्दर मॉडल को देखकर पूछ बैठे – यह कितना सुन्नदर है यह किसने बनाया है? प्रोफेसर ने उत्तर दिया किसी ने नहीं यह स्वयमेव बन गया है। मित्र ने कहा क्यों मजाक करते हो भला बिना बनाए भी कोई चीज बन सकती है? तो प्रोफ़ेसर ने कहा यह तुच्छ मॉडल जिस विशाल सौरमण्डल की एक लघु स्थिर प्रतिकृति मात्र है उसे ही आप बिना कर्ता के निर्मित हुआ नहीं मान रहे हो तो सुनिश्चित नियमों में बन्धे अत्यन्त विशाल सौरमण्डल को बिना कर्ता के क्यों मानते हो? और नियम भी कैसे? जिनमें अल्पांश में भी विक्षेप नहीं होता। इसी कारण ज्योतिर्विद हजारों वर्ष पूर्व ही भविष्य की खगोलीय घटनाओं का ठीक ठीक समय बता सकते हैं। अब मित्र के पास कोई उत्तर न था।
० ब्रह्माण्ड की विशालता का तनिक अनुमान लगाइए – पृथ्वी का व्यास २५००० मील है । हम पृथ्वी पर बसे हुए सूर्य की परिक्रमा जिस परिधि में कर रहे हैं वह रास्ता ५८ करोड़ ८१लाख६०हजार मील लम्बा है जो हम एक बर्ष में तय करते हैं अर्थात् हम १११० मील प्रति मिनट अथवा ६६६०० मील प्रति घण्टा की गति पर सवार हैं। सूर्य एक पिघला हुआ आग का गोला है जो हमारे ९ ग्रहों को मिलाकर उनसे भी लगभग दो गुना भारी है। पृथ्वी से तेरह लाख गुना बड़ा है। सूर्य के चारों ओर ग्रह चक्कर लगारहे हैं।
१. बुध – यह सूर्य से ३ करोड़ ६० लाख मील सूर है।
२. शुक्र – यह सूर्य से ६ करोड़ ७० लाख मील दूर है।
३. पृथ्वी – यह सूर्य से ९ करोड़ २९ लाख ५७ हजार मील दूर है।
४. मङ्गल – यह सूर्य से १२ करोड़ ७० लाख मील दूर है।
५. बृहस्पति – यह सूर्य से ४८ करोड़ ४० लाख मील दूर है।
६. शनि – यह सूर्य से ८८ करोड़ ६० लाख मील दूर है।
७. अरुण – यह सूर्य से १ अरब ६० करोड़ मील दूर है।
८. वरुण – यह सूर्य से १ अरब ७४ करोड़ ६० लाख मील दूर है।
९. यम – सूर्य के इर्द-गिर्द इसकी परिक्रमा की कक्षा भी थोड़ी बेढंगी है – यह कभी तो वरुण (नॅप्टयून) की कक्षा के अन्दर जाकर सूर्य से ३० खगोलीय इकाई (यानि ४.४ अरब किमी) दूर होता है और कभी दूर जाकर सूर्य से ४५ खगोलीय इकाई (यानि ७.४ अरब किमी) पर पहुँच जाता है।
ऐसे अनेक सौर मण्डल मिलाकर एक आकाशगंगा कहते है अनेक आकाशगंगाओं की खोज के बाद भी वैज्ञानिक कहते कि ब्रह्माण्ड कितना बड़ा होगा यह तो कल्पना के भी बाहर है । क्या यह अनन्त ब्रह्माण्ड अल्पज्ञ, अल्प सामर्थ्यवान मनुष्य की रचना हो सकती है? अतः यह केवल प्रभु की सत्ता व सामर्थ्य का ही चमत्कार है।
यह भी विचारें कि इतने विशाल पिण्डों के साथ अकस्मात् के नियम को माने तो क्या ये कभी टकराएंगे नहीं । वास्तविकता तो यह है ये पिण्ड गति तथा परिभ्रमण के जिन नियमों से बन्धें हैं उनमें यत्किञ्च भी स्वेच्छाचारिता ये बरतसकें तो न सिर्फ स्वयं विनष्ट हो जाएंगे वरन् ब्रह्माण्ड ही समाप्त हो जायेगा। ऐसा इसलिए नहीं होपाता है क्योंकि ये सब नियन्ता के नियंत्रण में ही गतिशील हैं , स्वतन्त्र नहीं।
अतेव निश्चित सिद्धान्त यही है और यही समझना चाहिए कि कोई भी कार्य , रचना अथवा नियम बिना कर्ता, रचनाकार अथवा नियामक के सम्भव नहीं । हर कृति, हर नियम अपने कर्ता के होने का प्रबल प्रमाण है। इसीलिए वेद में कहा प्रभु की सत्ता पर विस्वास करना है तो उसकी रचना को देखो – ‘पश्य देवस्य काव्यं’। ईश्वर की नियमबद्ध सृष्टि ही उसके होने का सर्वोत्तम प्रमाण है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज वेद भाष्य में लिखते हैं-
तत्त इन्द्रियं परमं पराचैरधारयन्त कवयःपुरेदम्।
क्षमेदमन्यद् दिवन्यदस्य समी पृच्यते समनेव केतुः।। (ऋ०१/१०३/१)
हे मनुष्यों! जो जो इस संसार में रचना विशेष से युक्त उत्तम वस्तु है वह वह सब परमेश्वर के बनाने से ही प्रसिद्ध है ऐसा जानो। ऐसा विचित्र संसार विधाता के बिना संभव नहीं हो सकता। इसीलिए निश्चय ही इस जगत का रचयिता ईश्वर है और जीव – रचित सृष्टि का कर्ता जीव है।
ध्यान दें – यह धारणा की जड़ पदार्थ स्वयमेव अकस्मात् मिल गए और सृष्टि बन गई क्या बुद्धिगम्य है? सदैव स्मरण रखना चाहिए कि सृष्टि में संयोग के साथ वियोग भी प्रत्यक्ष है जो पदार्थ भिन्न – भिन्न तत्वों के मेल से बनता है वह कभी ना कभी विनष्ट भी होता है संयोग और वियोग के विपरीत गुण एक ही जड़ पदार्थ में न साथ साथ रह सकते हैं और न ही कार्य कर सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन जड़ परमाणुओं में संयोग का गुण है वे संयोग ही करेंगे तो वह पदार्थ विनष्ट कैसे होगा? इसी प्रकार जिन जड़ परमाणुओं में अलग अलग रहने की प्रवृत्ति है वे संयोग कैसे करेंगे अर्थात् पदार्थ बनेगा कैसे? यदि दोनों गुण एक साथ मान भी लिए जायें तो विरोधी होने के कारण न निर्माण होगा न विनाश । अतः ऐसी कोई समर्थ सत्ता चाहिए जो इन जड़ पदार्थों को स्व ईक्षण से मिलाती, कायम रखती व विनष्ट करती है। ब्रह्माण्ड की विशालता, विविधता, चमत्कारी अद्भुत नियमों की उपस्थिति पर दृष्टि डालते ही पता चल जाता है कि यह कार्य अल्पज्ञ मनुष्य का हो ही नहीं सकता । यह मात्र सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान ईश्वर का ही कार्य हो सकता है।
किसी चैतन्य सत्ता के अस्तित्व से इन्कार करने वाले बन्धुओं को विज्ञान द्वारा खोजे नियमों पर भी विचार कर लेना चाहिए जिन्हें वे सर्वोपरि स्वनिर्मित मानते हैं। महान वैज्ञानिक न्यूटन के गति का प्रथम नियम कहता है कि कोई वस्तु अपनी स्थिर अथवा गतिज अवस्था में ही रहेगी जब तक कि उस पर बाह्य बल का प्रयोग न किया जाए। विचारणीय है कि जगत गतिशील है इसे गति किसने प्रदान की? आधुनिक विज्ञान में जिन कणों को परमाणु कहा जाता है उस परमाणु की रचना देखिए। इसके केन्द्रक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रान हैं। इनके चारों ओर इलेक्ट्रॉन अपनी कक्षाओं में चक्कर लगा रहे हैं। इन्हीं इलेक्ट्रॉनों की संख्या व गति से परमाणु का अस्तित्व व क्रियाशीलता है। इन इलेक्ट्रॉनों को गतिमान किस बाह्यबल ने किया? विचारणीय यह है कि आज जिन फोटोन आदि कणों को विज्ञान मूल कण मान रहा है उनको सर्वप्रथम गति किसने प्रदान की? यह बल किसका है? और यदि गति आन्तरिक ऊर्जा के कारण है तो उस ऊर्जा का प्रदाता कौन है? सृष्ट्यारम्भ में मूल कणों (पदार्थ) को क्रियाशील कौन करता है? यह कार्य केवल उसी सत्ता का हो सकता है जो इन सूक्ष्म कणों से भी सूक्ष्म होने के साथ इस मानव कल्पनातीत ब्रह्माण्ड से भी विशाल होने के कारण ही उस सर्वत्र विरल रूप से विखरे मूल उपादान पदार्थ को क्रियाशील कर सकता है। जिसके बारे में कहा है-
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।। (कठोपनिषद्)
अणु से अति सूक्ष्म, बड़े से अधिक बड़ा परमात्मा इस जन्मधारी जीवात्मा के हृदय प्रदेश में विद्यमान है। यह केवल ईश्वर है। ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं। कोई हो ही नहीं सकता।
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्गवेद यदि वा न वेद।।(ऋग्वेद १०/१२९/७)
हे (अङ्ग) मनुष्य! जिससे यह विविध सृष्टि प्रकाशित हुई है, जो धारण और प्रलय कर्ता है, जो इस जगत् का स्वामी , जिस व्यापक में यह सब जगत उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय को प्राप्त होता है, सो परमात्मा है, उसको तू जान और दूसरे को सृष्टि कर्ता मत मान।
तम आसीत्तमसा गूळहमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकम्।। (ऋग्वेद १०/१३९/३)
यह सब जगत् सृष्टि से पहले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाश रूप सब जगह तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सामने एक देशी आच्छादित था। पश्चात् परमेश्वर ने अपने महिमा (सामर्थ्य) से कारण रूप से कार्यरूप कर दिया है।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।। (ऋग्वेद १०/१२१/१)
हे मनुष्यो! जो सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का आधार और जो जगत् हुआ था, है और होगा उसका एक अद्वितीय पति परमात्मा इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था और जिसने पृथ्वी से लेके सूर्य पर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है, उस परमात्मा देव की प्रेम से भक्ति किया करें।
पुरुषऽएवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति।।(यजुर्वेद ३१/२)
हे मनुष्यो! जो सब में पूर्ण पुरुष और जो नाश रहित कारण और जीव का स्वामी, जो पृथिव्यादि जड़ और जीव से अतिरिक्त है, वही पुरुष इस सब भूत, भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगत् को बनाने वाला है।


