दूसरों की सम्पन्नता यदि आपक दुःख का कारण है तो समझ लो कि आप मानसिक रूप से बीमार हैं

दूसरों की सम्पन्नता यदि आपक दुःख का कारण है तो समझ लो कि आप मानसिक रूप से बीमार हैं

मनुष्य के जीवन में सुख और दुःख का सबसे बड़ा कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसकी अपनी मानसिक वृत्तियाँ हैं। संसार में कोई व्यक्ति धनवान है, कोई विद्वान है, कोई बलवान है और कोई प्रतिष्ठित है। यदि इन सबको देखकर हमारे मन में प्रेरणा उत्पन्न होती है, तो यह स्वस्थ मन का लक्षण है; किन्तु यदि ईर्ष्या, द्वेष, जलन और दुःख उत्पन्न होता है, तो यह मन की दुर्बलता का संकेत है।

दूसरे की सम्पन्नता किसी का सुख नहीं छीनती। वह केवल हमारे मन में छिपी हुई असन्तोष और तुलना की प्रवृत्ति को उजागर करती है।

ईर्ष्या क्यों उत्पन्न होती है?

ईर्ष्या का मूल कारण है—

स्वयं की दूसरों से तुलना करना।

असन्तोष।

अहंकार।

दूसरों की उन्नति को अपनी हार समझना।

परिश्रम के स्थान पर भाग्य या परिस्थितियों को दोष देना।

जिस मनुष्य का मन संतोष और पुरुषार्थ से भरा होता है, वह दूसरों की सफलता से प्रेरणा लेता है। लेकिन जिसका मन ईर्ष्या से भरा होता है, वह दूसरों की उन्नति देखकर स्वयं जलता रहता है।

महर्षि पतञ्जलि का प्रमाण

पतञ्जलि योगसूत्र में मन की शान्ति का अत्यन्त प्रभावी उपाय बताया गया है—

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥

जो सुखी हैं उनके प्रति मैत्री, दुःखी के प्रति करुणा, पुण्यात्माओं एवं उन्नति करने वालों के प्रति मुदिता (प्रसन्नता) और दुष्ट कर्म करने वालों के प्रति उपेक्षा का भाव रखने से चित्त प्रसन्न और निर्मल होता है।

यदि किसी की उन्नति देखकर हमारा मन दुःखी हो, तो यह योग के अनुसार चित्त की अशुद्धि है।

गीता का प्रमाण

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

अर्थात् श्रेष्ठ मनुष्य किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है।

इसी प्रकार गीता में कहा गया है—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभः…

लोभ और उससे उत्पन्न ईर्ष्या मनुष्य के पतन का कारण बनते हैं।

ऋग्वेद का संदेश

ऋग्वेद में समाज को एकता और सद्भाव का संदेश दिया गया है—

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।

मिलकर चलो, मिलकर विचार करो और अपने मनों को एक करो।

जहाँ एकता और सद्भाव है, वहाँ ईर्ष्या के लिए कोई स्थान नहीं रहता।

महर्षि दयानन्द सरस्वती का दृष्टिकोण

महर्षि जी ने अनेक स्थानों पर यह प्रतिपादित किया है कि मनुष्य को सत्य, न्याय, पुरुषार्थ और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दूसरों की उन्नति से जलना नहीं, बल्कि स्वयं पुरुषार्थ करके उन्नति करना ही आर्य का धर्म है।

“हमें अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिए बल्कि सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए ।”

आर्य समाज का एक प्रमुख सिद्धान्त है—

“संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है।”

जो व्यक्ति संसार के उपकार की भावना रखता है, वह दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या नहीं कर सकता।

ईर्ष्या का दुष्परिणाम

ईर्ष्यालु व्यक्ति—

कभी संतुष्ट नहीं रहता।

मानसिक तनाव में रहता है।

दूसरों की आलोचना करता है।

अपनी उन्नति की अपेक्षा दूसरों की हानि चाहता है।

उसका मन अशान्त और अशुद्ध हो जाता है।

ऐसा व्यक्ति स्वयं भी सुखी नहीं रहता और दूसरों को भी सुखी नहीं देख पाता।

स्वस्थ मानसिकता कैसी होती है?

स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कहता है—

“यदि मेरे भाई ने सफलता प्राप्त की है, तो यह मेरे लिए भी प्रेरणा है। मैं भी पुरुषार्थ करूँगा और आगे बढ़ूँगा।”

ऐसी भावना से समाज में प्रेम, सहयोग और विकास होता है।

ध्यान दें –

दूसरों की सम्पन्नता कभी भी हमारे दुःख का कारण नहीं होती; हमारा दृष्टिकोण ही दुःख का कारण बनता है। यदि किसी की उन्नति देखकर मन प्रसन्न होता है, तो समझिए कि मन स्वस्थ है।

यदि ईर्ष्या होती है, तो आत्मचिन्तन की आवश्यकता है।

अतः हमें योग के “मुदिता” भाव को अपनाना चाहिए, गीता के “अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्” का पालन करना चाहिए और वैदिक आदर्श “सर्वे भवन्तु सुखिनः” को जीवन में उतारना चाहिए। जब हम दूसरों के सुख में सुखी होना सीख लेते हैं, तभी हमारा अपना जीवन भी शान्त, प्रसन्न और सार्थक बनता है।

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