सही मूल्यांकन तो अपरिचितों द्वारा होता है परिचित या तो अधिक अंक देंगे या फिर कम।
मनुष्य का सही मूल्यांकन करना अत्यन्त कठिन कार्य है। मूल्यांकन तभी निष्पक्ष माना जाता है जब उसमें न पक्षपात हो, न पूर्वाग्रह और न ही किसी प्रकार का व्यक्तिगत लगाव या विरोध। इसी कारण यह कहा जाता है कि “सही मूल्यांकन तो अपरिचितों द्वारा होता है, परिचित या तो अधिक अंक देंगे या फिर कम।”
परिचित व्यक्ति हमारे स्वभाव, सम्बन्धों और व्यक्तिगत व्यवहार से प्रभावित होता है। यदि वह हमारा शुभचिन्तक है तो हमारी छोटी-सी उपलब्धि को भी बहुत बड़ा मान सकता है। दूसरी ओर यदि किसी कारण से उसके मन में ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा या मतभेद है, तो वह हमारी बड़ी उपलब्धियों को भी छोटा सिद्ध करने का प्रयास कर सकता है। इसलिए परिचितों का मूल्यांकन प्रायः भावनाओं से प्रभावित हो जाता है।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति हमें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, वह सामान्यतः हमारे कार्य, योग्यता, चरित्र और उपलब्धियों के आधार पर निर्णय करता है। उसके सामने न मित्रता का दबाव होता है और न शत्रुता का। इसलिए उसके निर्णय में निष्पक्षता की संभावना अधिक होती है।
इतिहास में भी अनेक महापुरुषों के साथ ऐसा हुआ कि अपने लोगों ने उनका विरोध किया, किन्तु दूर-दूर के लोगों ने उनके गुणों को पहचाना। महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी तथा अनेक वैज्ञानिकों और विचारकों को अपने जीवनकाल में अपने ही समाज से विरोध सहना पड़ा, जबकि अन्य स्थानों पर उन्हें सम्मान और आदर मिला। इससे स्पष्ट होता है कि निकटता कभी-कभी वस्तुनिष्ठ दृष्टि को कम कर देती है।
हमें भी अपने जीवन में यह सीख लेनी चाहिए कि प्रशंसा से अहंकार और आलोचना से निराश होने के स्थान पर अपने कार्य की गुणवत्ता बढ़ाने पर ध्यान दें। यदि हमारा कार्य उत्कृष्ट होगा, तो निष्पक्ष और विवेकशील लोग उसका उचित मूल्यांकन अवश्य करेंगे।
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मूल्यांकन में निष्पक्षता सबसे महत्वपूर्ण गुण है।
अत्यधिक निकटता या दूरी, दोनों निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं, परन्तु व्यक्तिगत सम्बन्ध प्रायः पक्षपात की संभावना बढ़ाते हैं।
प्रशंसा और आलोचना दोनों को विवेकपूर्वक स्वीकार करना चाहिए।
अपने कार्य को इतना श्रेष्ठ बनाइए कि वह स्वयं आपकी पहचान बन जाए।
व्यक्ति का लक्ष्य लोगों को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य का उत्कृष्ट निर्वाह करना होना चाहिए।
समय अन्ततः प्रत्येक व्यक्ति का सही मूल्यांकन कर देता है।
सच्ची प्रतिष्ठा प्रशंसा से नहीं, बल्कि निष्पक्ष मूल्यांकन से प्राप्त होती है। इसलिए हमें अपने व्यक्तित्व और कर्म को ऐसा बनाना चाहिए कि जो भी हमें देखे—चाहे परिचित हो या अपरिचित—वह सत्य और न्याय के आधार पर हमारे गुणों को स्वीकार करने के लिए विवश हो जाए। वस्तुतः व्यक्ति का सबसे बड़ा परिचय उसके शब्द नहीं, उसके कर्म होते हैं; और कर्मों का सबसे विश्वसनीय मूल्यांकन वही कर सकता है जो पूर्वाग्रहों से मुक्त हो।


