आपको दवा अच्छी लगने वाली चाहिए या रोग का उपचार करने वाली चाहिए ?

आपको दवा अच्छी लगने वाली चाहिए या रोग का उपचार करने वाली चाहिए ?

👉 आज का मनुष्य एक विचित्र मानसिकता का शिकार हो गया है। वह ऐसी बात सुनना चाहता है जो उसे अच्छी लगे, चाहे उससे कोई लाभ न हो। इसके विपरीत जो बात उसके दोषों को सामने लाकर सुधार का मार्ग दिखाती है, उससे वह बचना चाहता है। यही प्रवृत्ति केवल चिकित्सा में ही नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देती है।

👉 जब कोई व्यक्ति रोगग्रस्त होता है, तो उसका उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि दवा स्वादिष्ट हो, बल्कि यह होना चाहिए कि रोग दूर हो जाए। यदि कड़वी दवा रोग का समूल नाश कर देती है, तो वही श्रेष्ठ है। दूसरी ओर यदि मीठी दवा केवल स्वाद दे और रोग को बढ़ने दे, तो उसका कोई मूल्य नहीं।

👉 इसी प्रकार जीवन में भी हमें ऐसे उपदेश, विचार और मार्गदर्शन की आवश्यकता है जो हमारे दोषों को दूर करें। जो व्यक्ति केवल प्रशंसा सुनना चाहता है, वह कभी अपने दोषों को नहीं देख पाता। सच्चा हितैषी वही है जो आवश्यकता पड़ने पर कटु सत्य भी कहने का साहस रखता है।

👉 महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी समाज में फैले अज्ञान, अन्धविश्वास और कुरीतियों पर निर्भीक प्रहार किया। उनके विचार अनेक लोगों को कठोर लगे, परन्तु उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं, बल्कि समाज के रोगों का उपचार करना था। वैद्य जिस प्रकार रोग देखकर औषधि देता है, उसी प्रकार महापुरुष समाज के दोष देखकर सत्य का उपदेश देते हैं।

👉 वैदिक दृष्टि से सत्य को स्वीकार करना और असत्य का त्याग करना ही मनुष्य का परम धर्म है। सत्य कभी-कभी कड़वा प्रतीत हो सकता है, परन्तु उसका परिणाम सदैव कल्याणकारी होता है। असत्य चाहे कितना भी मधुर क्यों न लगे, अन्ततः वह हानि ही पहुँचाता है।

👉 जीवन में इस सिद्धान्त का प्रयोग

यदि गुरु केवल प्रसन्न करने वाली बातें कहे और शिष्य के दोष न बताए, तो वह सच्चा गुरु नहीं।

यदि माता-पिता केवल बच्चों की इच्छाएँ पूरी करें और अनुशासन न सिखाएँ, तो उनका भविष्य संकट में पड़ सकता है।

👉 यदि समाज केवल प्रशंसा सुनना चाहे और आत्मचिन्तन न करे, तो उसका पतन निश्चित है।

यदि राष्ट्र अपनी कमियों को स्वीकार न करे, तो उसका विकास रुक जाता है।

इसलिए हमें यह निर्णय करना होगा कि हमें केवल मन को अच्छा लगने वाली बातें चाहिए या वास्तव में जीवन का कल्याण करने वाले सत्य।

👉 जैसे रोगी कड़वी औषधि पीकर स्वस्थ हो जाता है, वैसे ही सत्य, अनुशासन, आत्मचिन्तन और सुधार को स्वीकार करने वाला व्यक्ति महान बनता है। जो केवल मधुर शब्दों के पीछे भागता है, वह अपने दोषों को छिपाता रहता है और अंततः उनका दुष्परिणाम भोगता है।

#अतः_प्रश्न_यह_नहीं_है_कि_दवा_मीठी_है_या_कड़वी। प्रश्न यह है कि क्या वह रोग का उपचार करती है?

👉 इसी प्रकार हमें यह नहीं देखना चाहिए कि उपदेश सुनने में मधुर है या कठोर। हमें यह देखना चाहिए कि क्या वह हमारे जीवन, समाज और राष्ट्र के दोषों का उपचार कर रहा है।

याद_रखिए

“जो केवल अच्छा लगता है, वह हमेशा हितकारी नहीं होता; और जो हितकारी होता है, वह प्रारम्भ में हमेशा अच्छा नहीं लगता।”

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति प्रशंसा नहीं, सुधार चाहता है; मधुर भ्रम नहीं, कटु सत्य चाहता है; और ऐसी औषधि चाहता है जो रोग को मिटा दे, चाहे उसका स्वाद कैसा भी क्यों न हो।

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