तुम क्या हो इसका मूल्यांकन तुम्हारे बाद होगा।
मनुष्य अपने जीवन में अपने बारे में अनेक धारणाएँ बना सकता है। वह स्वयं को महान समझे या साधारण, सफल माने या असफल—परन्तु उसका वास्तविक मूल्यांकन वह स्वयं नहीं करता, बल्कि समाज, इतिहास और आने वाली पीढ़ियाँ करती हैं। इसलिए कहा गया है—”तुम क्या हो, इसका मूल्यांकन तुम्हारे बाद होगा।”
मनुष्य के जीवन का वास्तविक परिचय उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से मिलता है। जीवन रहते हुए व्यक्ति की प्रशंसा और आलोचना दोनों होती रहती हैं। कभी लोग स्वार्थवश उसकी प्रशंसा करते हैं, तो कभी ईर्ष्या या विरोध के कारण उसकी निन्दा भी करते हैं। इसलिए जीवित अवस्था में मिलने वाली प्रसिद्धि ही किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान नहीं होती।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक महापुरुषों का उचित मूल्यांकन उनके जीवनकाल में नहीं हुआ। उनके विचारों का विरोध हुआ, उन्हें कष्ट सहने पड़े, परन्तु उनके देहावसान के बाद समाज ने उनके योगदान को समझा और उन्हें युगपुरुष के रूप में स्वीकार किया। दूसरी ओर, ऐसे अनेक लोग भी हुए जिन्हें जीवनकाल में अत्यधिक सम्मान मिला, परन्तु समय के साथ उनका प्रभाव समाप्त हो गया क्योंकि उनका जीवन स्थायी मूल्यों पर आधारित नहीं था।
मनुष्य की महानता उसके पद, धन, प्रसिद्धि या बाहरी वैभव से नहीं मापी जाती। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उसने समाज को क्या दिया, कितने लोगों के जीवन में प्रकाश फैलाया, सत्य और न्याय के लिए कितना संघर्ष किया, तथा अपने जीवन से कौन-से आदर्श स्थापित किए।
वेदों की शिक्षा है कि मनुष्य ऐसा जीवन जिए जिससे सम्पूर्ण समाज का कल्याण हो। “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का संदेश केवल स्वयं के उत्थान का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के उत्थान का आह्वान है। जो व्यक्ति अपने जीवन को लोकहित, सत्य, धर्म, शिक्षा, सेवा और राष्ट्रनिर्माण के लिए समर्पित कर देता है, उसका यश उसके शरीर के साथ समाप्त नहीं होता। उसका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा था कि “सत्य को ग्रहण करो और असत्य को छोड़ो।” उन्होंने अपने जीवन में सत्य के लिए संघर्ष किया। उनके जीवनकाल में उन्हें अनेक विरोधों का सामना करना पड़ा, परन्तु आज उनका मूल्यांकन एक महान समाज-सुधारक, वैदिक धर्म के पुनर्जागरणकर्ता और राष्ट्रजागरण के अग्रदूत के रूप में किया जाता है। यही सिद्ध करता है कि समय ही व्यक्ति के वास्तविक मूल्य का निर्णय करता है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि लोग आज उसके बारे में क्या कह रहे हैं। उसे केवल इस बात की चिन्ता करनी चाहिए कि उसके कर्म सत्य, न्याय, सेवा और चरित्र पर आधारित हों। यदि जीवन उत्कृष्ट होगा तो मृत्यु के बाद भी उसका नाम सम्मानपूर्वक लिया जाएगा। यदि जीवन स्वार्थ, छल और अहंकार में बीतेगा तो समय स्वयं उसका निर्णय कर देगा।
“कीर्ति यस्य स जीवति।”
अर्थात् जिसकी श्रेष्ठ कीर्ति रहती है, वही वास्तव में जीवित रहता है।
अतः मनुष्य का लक्ष्य क्षणिक प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसा चरित्र निर्माण करना होना चाहिए जो उसके बाद भी समाज के लिए प्रेरणा बना रहे। अपने जीवन को इस प्रकार बनाइए कि आपकी अनुपस्थिति में भी आपके कार्य बोलें, आपके संस्कार जीवित रहें और आपका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकाशस्तम्भ बन जाए।


